मन की आस- वो मेरा अपना कोना #ThursdayPoetry

मन की आस- वो मेरा अपना कोना #ThursdayPoetry

तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूँ- माँ-बाबा मैं जानती हूँ,
यह घर मेरा नहीं रहा अब लेकिन क्या करूँ मैं तो अब भी अपना मानती हूँ,
जब तुम्हारे पास आती हूँ तो यहाँ सब कहते हैं बहू अपने घर जा रही है,
जब वहाँ से वापस आती हूँ तो भी सब कहते हैं अपने घर वापस जा रही हो बिटिया,
भारी मन असमंजस में पड़ जाता है,
क्या मेरे दो घर हैं या एक भी नहीं?
एक समय लगता भी यही है कि कोई भी घर पूरी तरह मेरा नहीं,
मायके में हक से कोई सामान छोड़ नहीं सकती किसी कोने पर अपना हक जमा नहीं सकती,
और यहाँ जिसे सारा जमाना मेरा घर कहता है,
यहाँ भी तो मैं और मेरा सामान इधर से उधर होते रहते हैं,
सबकी जरूरत के मुताबिक मैं अपनी जगह बदल लेती हूँ, कोई प्रतिकार नहीं करती,
अपना सामान हटाकर तुम्हारा सामान रख देती हूँ,
देखने में बहुत सहज है यह क्योंकि मैं गृहस्वामिनी हूँ व्यवस्था तो मुझे ही रखनी है,
लेकिन अंतरमन कहता है इस घर में एक कोना मुझे भी दे दो जो मैं किसी के लिए न छोड़ूँ
कोई डिस्कवरी चैनल देख रहा होता है,
किसी को फास्ट म्यूजिक सुनना होता है,
मुझे भी तो ओल्ड मैलोडी भाती है,
लेकिन तुम सब के लिए मैं ही अपने गानों की आवाज कम कर देती हूँ,
ईयर प्लग का सुझाव मुझे मत दो नहीं भाता मुझे ऐसे गाने सुनना,
मुझे घर मैं एक छोटा सा कोना दे दो-जहाँ मैं खुद को महसूस कर सकूँ,
सूकून से बिखर कर खुद से मिल सकूँ।

~सुमेधा, (#सुमेधास्वलेख) स्वरचित, मौलिक।

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