मन की खिड़की खोल दे...

मन की खिड़की खोल दे...

अकेले दौड़ने वाले जीतेगा किससे ?
जब कोई और दौड़ने वाला ही न होगा,
जीत की खुशी आयेगी कैसे तेरे हिस्से,
आगे बढ़ने वाले को गिराने का हुनर आता है तुम्हें,
यह क्यों नहीं कहते कि बियांबा ही भाता है तुम्हें,
अहम से भरे हुए के पास केवल चाटुकार होते हैं,
रौनक वहीं होती है जहाँ दिलदार होते हैं,
ठूँठ के हिस्से विरानी ही आती है,
बाँहे फैलाता है जो दरख़्त चिड़िया उसे ही तराना सुनाती है,
सुमन वहीं खिलते हैं जहाँ भूमि उदार हो,
समझ लेगा जो इसको तो शायद तेरा भी उद्धार हो,
अकेले गुल से कभी गुलशन नहीं सजता,
कागज के फूलों से कभी इत्र नहीं बनता,
खोखला दम्भ दीमक की तरह खा जायेगा,
खोल दे मन की खिड़की चटख  धूप आने दे,
हटेगी सिलन तो गुनगुनाहट आयेगी,
एक नयी आभा एक नयी सोच से तेरी रचना निखर जायेगी,
दर्प से दूषित भावों का सृजन कल्याणकारी न हो पायेगा,
सराहना करना सीख एक नया आकाश पा जायेगा।
   
#अनकहेभाव #अनछुएअहसास

सुमेधास्वलेख,
स्वरचित, मौलिक।

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