मानसिकताओं से आज़ादी

मानसिकताओं से आज़ादी


शेखर- ये लो तुम्हारी चाय, बिल्कुल जैसी तुम्हें पसंद है।
श्रेया- अरे वाह! क्या बात है! कोई स्पेशल दिन है आज?
शेखर- इंडिपेंडेंस डे!
श्रेया- तो मतलब, आज मेरी किचन से छुट्टी! बढ़िया है।
ये कहते हुए, श्रेया अखबार के पन्ने पलटने लगी।
थोड़ी ही देर में, शेखर ने गर्मा गर्म नाश्ता बनाकर, श्रेया को खिलाया।
श्रेया- अच्छा शेखर, मेरे लिए आज इंडिपेंडेंस डे है चलो माना,पर तुम्हारी इंडिपेंडेंस डे का क्या?
शेखर - मेरा इंडिपेंडेंस डे? ये नियम पतियों पर लागू होता है क्या? मज़ाक मत करो, श्रेया।
श्रेया- मज़ाक नहीं है, बताओ न,तुम्हें किस चीज़ से आज़ादी चाहिए, जिससे लगे कि ये मेरा इंडिपेंडेंस है?
शेखर - पता नहीं, पर फिर भी अगर तुम पूछ रही हो तो, कुछ बातें हैं जो अक्सर मुझे मजबूर कर देतीं हैं, ये सोचने के लिए, की काश इनसे आज़ादी मिल जाती।
श्रेया- जैसे कि?

शेखर - अपनी भावनाओं को दिखाना, किसी स्तिथि में समर्थन या मदद मांगना , ये अक्सर हम पुरुषों को कमजोर दर्षाती है। मुझे इस सोच से आज़ादी चाहिए। क्या गलत है अगर हम ये सब करें तो? क्यों हमें ये सुनना पड़ता है कि, ये लडक़ों को शोभा नहीं देता, तुम्हें किसी के सहारे की जरूरत नहीं?

क्यों हमारे लिए ये सोच नहीं कि चाहे हम मौन हों या फिर किसी मुद्दे पर बोल रहें हों, हमें भी उसी संवेदनशीलता के साथ समझा जाए,जैसा औरों को समझा जाता है, न कि ये कहकर हमें दरकिनार कर दिया जाए, कि तुम तो ऐसे ही हो, तुम्हें कुछ समझ नहीं, तुम पुरूष हो,तुम्हें क्या पता?

क्यों हमें आँसुओ के गिरने से पहले ही, उसे पोंछने की सीख दी जाती है? तो क्या हुआ हम पुरूष हैँ, उसके पहले तो हैं एक इंसान ही। क्यों हमारी तुलना आक्रोश से की जाती है?
और जो हम बहुत ही कोमल हृदय के हों तो हमारा मज़ाक बनाया जाता है?

समय बदल जरूर रहा है, लेकिन आज भी अक्सर रोजमर्रा के बातों में ऐसे कई पल आते हैँ, जब ये लगता हैं कि, काश मुझे और मुझ जैसे कई पुरुषों को मानसिकताओं के बिनाह पर बनाई गई भूमिकाओं से आज़ादी मिल जाती।

श्रेया - वाह शेखर,  कम शब्दों में तुमने जो कुछ कहा उसके मायने बहुत ही गहरे हैं। सच ही तो कहा तुमनें, इन मानसिकताओं से क्यों नहीं तुम्हें आज़ादी मिल सकती?

सुष्मा त्रिपाठी

What's Your Reaction?

like
0
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0