मेहनताना बराबर का

मेहनताना बराबर का

"कल से दुकान बंद करनी पड़ेगी या बीच-बीच में खोलनी पड़ेगी,नया घर जो बनवाना है।"-अनूप ने पत्नी मीना से कहा।"बीच-बीच में छुट्टियां मैं ले लूँगी,रोहन को लेकर प्लाट में मैं चली जाऊंगी।"मीना ने अनूप को समझाते हुए कहा।

अनूप ने मीना से कहा-" रोहन और तुम भी कितना जाओगे।एक दिन की बात तो है नहींं।तुम अपने ऑफिस जाती हो और वह अपने कॉलेज।मैं कंस्ट्रक्शन का काम ठेके में दे देता हूँँ।हम लोग की भागदौड़ भी कम होगी और काम भी निश्चिंत हो जाएगा।"

दो दिन बाद संडे था तीनों प्लाट में गये।अनूप ठेकेदार से जल्दी और सही काम करने की हिदायत दे रहा था।तभी उसने सब मजदूरों को बुलाया।देखा 5-6 मजदूर आ रहे थे उनमें से दो महिलाऐं भी थी।उनमें से एक गर्भवती लग रही थी।गर्भवती मजदूर को देखकर मीना और अनूप चौंक पड़े।

अनूप ठेकेदार से बोला-" यह कैसे काम करेगी?यह तो पेट से है। भारी भरकम सामान कैसे उठाएगी?किसी और को मजदूरी में रखना था।"

"इसे काम की जरूरत है और इसकी देखभाल करने के लिए इसका यह पति रहा।"- एक मजदूर की तरफ इशारा करते हुए ठेकेदार ने कहा।

उसको देख कर मीना और अनूप का मन आत्मग्लानी से भर गया।मीना ने देखा उसकी उम्र कोई बीस-इक्कीस की होगी और हाथ और मुँह में मिट्टी लगी थी।सिर पर गोल किया हुआ कपड़ा और हाथ परात(तसला) थी।

जब सब मजदूर चले गये तब अनूप ने उदास होकर कहा-"इस पापी पेट के लिए इसे काम करना पड़ रहा है,मैं इस औरत को बुलाता हूं कहीं इसका पति से जबरदस्ती काम तो नहीं कर पा रहा है।"इतने में रोहन आकर बोला-" मम्मी, दूसरे वाले कोने में एक बच्चा सो रहा है देखिए चल के।"

मीना और अनूप रोहन के साथ वहां पहुंचे वहां पर वही गर्भवती महिला और एक डेढ़ साल की बच्ची को चुप करा रही थी। मीना और अनूप हैरानी से उस मजदूर औरत को देखने लगे कि एक बच्चा डेढ़ साल का है और दूसरा वह पेट से है।

मीना ने उस गर्भवती औरत से पूछा-"तुम्हारा नाम क्या है?"वह बच्चे को पानी पिलाती हुई बोली-"ममता"

" कितना महीना चल रहा है?" मीना ने उसकी पेट की तरफ देखते हुए बोला?ममता ने उंगली के इशारे से बताया सातवाँ महीना।

अब अनूप ने कहा-"तुम पेट से हो तुम कुछ महीने के लिए मजदूरी करना बंद कर द। अपना और अपने बच्चे का ख्याल रखो। अंत के महीने बहुत रिस्की होते हैं और यह तुम्हारा बच्चा भी डेढ़ साल का है।"

इतने में ठेकेदार और ममता का मजदूर पति भी आ गया। मीना ने ममता से पूछा-"तुम्हें एक दिन की कितनी दिहाड़ी मिलती है?" ममता बोली-"बहन जी डेढ़ सौ रुपए।" फिर मीना ने  ममता के पति से पूछा-"और तुम्हें कितनी दिहाड़ी मिलती है?" ममता का पति बोला -"ढाई सौ रुपये।" मीना यह सुनकर हैरान रह गई कि दोनों एक ही काम करते हैंं, एक ही कार्यक्षेत्र है और दोनों का काम का समय भी एक ही है जबकि ममता गर्भवती भी है फिर भी दोनों की दिहाड़ी में कितना अंतर है।

अनूप ने ठेकेदार से पूछा-"ऐसा क्यों?" ठेकेदार ने बोला-" यह औरत है और औरतें ज्यादा भारी काम नहीं कर सकती है इसीलिए इसकी तनख्वाह कम है।" ठेकेदार की बात काटते हुए मीना बोली-" पर यह तो कितनी भारी इंटे उठा रही है, ऊपर से यहां गर्भवती है यह तो सरासर गलत है इसको भी उतनी ही मजदूरी मिलनी चाहिए जितनी पुरुष को मिलती।"

अनूप ने ममता और उसके मजदूर पति से कहा-" तुम 5-6 महीने तक कोई काम नहीं करोगी ।तुम अपना और अपने बच्चे का ख्याल रखो बस। इसके डिलीवरी और खाने पीने का खर्च हम उठायेंगे।

मीना अपने पति के इस फैसले से खुश थी पर वह सोचने लगी कि एक औरत पुरुष के मुकाबले ही कार्य करती है पर उसकी मेहनत को हमेशा से ही एक पुरुष से कम आंका जाता है। वह खुद भी अपने बारे में सोचने लगी कि वह एक एकाउंटेंट है पर उसको अपने साथ काम करने वाले एकाउंटेंट पुरुषों के मुकाबले में कम तनखा मिलती है।

ममता ने अपने गर्भ में हाथ फेरते हुए हँसते हुए ईश्वर का धन्यवाद देने लगी।

स्वरचित व मौलिक

धन्यवाद

राधा  गुप्ता 'वृन्दावनी'

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