मेरे लेखन जीवन का सफर

मेरे लेखन जीवन का सफर



जीवन बड़ा ही अतरंगी होता है जैसे प्रकृति हमें अपने हजारों रंग दिखाती है वैसे ही ताउम्र अनेक रंग हमारी जिंदगी में आते और जाते हैं। कभी खुशी कभी गम वाले भाव दे जाते हैं।
अपने बारे में यदि मैं कहूं तो यह सच है कि बचपन से ही मुझे पढ़ने का बहुत शौक रहा है लेकिन लिखने के बारे में तो मैंने कभी नहीं सोचा था।

बचपन में मेरे दादाजी हर हफ्ते हमारे लिए एक नई कॉमिक्स लेकर आया करते थे मोटू पतलू, चाचा चौधरी, चंपक, चंदा मामा और भी न जाने कितनी ही किस्से कहानियों की किताबें लाकर वह दिया करते थे। वहां से जो पढ़ने का शौक शुरू हुआ तो वह आज भी वैसे ही कायम है।

थोड़े बड़े हुए तो उपन्यास, मैगजीन, साइंस फिक्शन ऐसी ही तमाम पुस्तकों को पढ़ने का शौक बना रहा। पहले तो यह हालत थी कि किसी के हाथ में कैसी भी किताब जो मेरी पढ़ी हुई ना हो तो मन में उसे पढ़ने का जुनून सहा भी हो जाता था कि बस एक बार पढ़ने को मिल जाए।
ग्रेजुएशन के बाद ही विवाह हो गया तो 10-15 साल ऐसे ही निकल गए। जब बच्चे बड़े हो गए तो जिम्मेदारियां भी कुछ कम हो गई। खाली समय में पढ़ना मेरा पसंदीदा शगल था अब तो बहुत ज्यादा ही है रोज न्यूज़पेपर जब तक एक घंटा बैठकर तसल्ली से एक-एक खबर ना पढ़ लूं तब तक चैन नहीं आता। पहले भी मन में बहुत सारे विचार आते थे लेकिन खुद पर भरोसा नहीं था कि मैं भी कुछ लिख सकती हूं। तब मेरी प्रिय सखी आरती चतुर्वेदी ने बताया कि उसकी बहन जो मेरी भी सखी
 है वह ब्लॉग लिखती है पिंक कॉमरेड वेबसाइट पर। तो जैसे मेरी भी उम्मीदों को पंख लग गए कि मैं भी इस साइट पर लिख कर देखती हूं।

तब पिछले लॉकडाउन से आरंभ हुआ यह सफर अभी तक जारी है तो मैं अपने आपको अभी लेखिका तो नहीं कहूंगी क्योंकि यह तो मेरा शैशव काल है लेखन के संसार में। अभी तो बहुत कुछ सीखना है पढ़ना है और फिर लिखना है। अब भी जब कोई विचार या लघु कथा सर्वश्रेष्ठ लेखन में आती है तो मन को बहुत सुकून मिलता है कि मेरी दिशा और दशा एकदम सही है।
 स्वरचित
 सुषमा राठौर

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