मेरे पापा असली हीरो हैं

मेरे पापा असली हीरो हैं

वीरसिंह कुम्हार हरियाणा -  दिल्ली बॉर्डर से सटे एक छोटे से गांव में अपनी मां,पत्नी व बेटे सोहित के साथ रहता था। पिता की आसमयिक मृत्यु के कारण बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़ उन्होंने अपने पुश्तैनी काम को संभाल लिया था। वीरसिंह के हाथों का कमाल कहे या उसकी अपने हुनर पर पकड़ कि उसके हाथों के बने घड़े व सुराही का पानी इतना ठंडा रहता था कि वो फ्रिज को भी मात देता था। साथ ही उसके बनाए मिट्टी के बर्तन ज्यादा मजबूत व टिकाऊ होते थे।इसी कारण आसपास के गांवों में उसके बनाए मिट्टी के बर्तनों की मांग दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी।उसने भी अब अपने काम को धीरे धीरे बढ़ाना शुरू कर दिया था।

वीरसिहं ने बेटे को पांचवीं कक्षा तक गांव में ही पढ़ाया था। चूंकि सोहित पढ़ाई में अच्छा था लेकिन वहां कोई बढ़िया स्कूल नहीं था इसलिए उन्होंने सोहित का दाखिला शहर के एक प्रतिष्ठित स्कूल में करवा दिया। वीरसिहं कम पढ़ा लिखा जरूर था।लेकिन उसकी सोच ऊंची थी।तभी तो जहां गांव में सभी के कई कई बच्चें थे। उसने केवल एक संतान ही की।क्योंकि वह जानता था कि इस कमाई में वह एक बच्चें की ही परवरिश ढंग से कर सकता है।

सोहित ने भी कभी अपने पापा को निराश नहीं किया। वह पढ़ाई लिखाई के साथ साथ उनके काम में भी हाथ बंटाता था। किंतु जब से वह ग्यारहवीं कक्षा में आया था, वीर सिंह को उसके स्वभाव में कुछ परिवर्तन नजर आने लगा था।पहले तो उन्हें लगा शायद किशोरावस्था के कारण या पढ़ाई लिखाई के बढ़ते दबाव की वजह से शायद वो चिड़चिड़ा हो रहा है। इसलिए उन्होंने नजरअंदाज कर दिया। लेकिन धीरे-धीरे सोहित की फरमाइशें बढ़ती जा रही थी। महंगे कपड़े,जूते यहां तक कि वो अब उन्हें कार खरीदने के लिए कहने लगा था। उन्होंने उसे कई बार समझाया भी कि हमारी हैसियत इतनी नहीं कि कार खरीदे और कार की हमें जरूरत भी क्या है।लेकिन सोहित तर्क देता कि स्कूल में उसके सब दोस्तों के घर में कार है। मुझे नहीं अच्छा लगता आप मेरे स्कूल बस से आएं।

वीरसिहं समझ गया था कि बेटा नए जमाने कि हवा में बह उसके सिखाए संस्कार भूलने लगा है। वह अपनी तरफ से उसे समझा कर थक चुका था। और किशोर बच्चों को ज्यादा कुछ कह भी नहीं सकते क्योंकि वह एक अलग ही दुनिया में जीते हैं जहां सारे तर्क वितर्क फेल हैं।अब तो सोहित अपने पापा के काम से भी कटने लगा था। लेकिन एक दिन तो हद हो गई जब उन्होंने उसे फोन पर अपने दोस्त को यह कहते सुना कि उसके पापा बिज़नेस के सिलसिले में बाहर गए हुए हैं।यह सुन उन्हें बड़ा धक्का लगा कि उनका बेटा ही उनके काम को छोटा समझने लगा है  कल तक जो खुद नन्हे हाथों से चाक चलाया करता था।आज उसे अपने दोस्तों को उस काम के बारे में बताने में शर्म आने लगी है।

अगले दिन जब सोहित स्कूल से आया तो वह कुछ परेशान सा था। पूछने पर उसने बताया , स्कूल से प्रोजेक्ट मिला है कि किसी ऐसे व्यक्ति का इंटरव्यू लेकर आना है । जिसने अपने दम पर अंधेरों से निकल अपनी पहचान समाज में बनाई हो।
"बस इतनी सी बात के लिए परेशान हो रहा है। रविवार को मेरे साथ चलना मैं तुम्हारा प्रोजेक्ट पूरा करवाता हूं।"
"आप जानते हैं क्या ऐसे व्यक्ति को? कहां रहते हो वो?" सोहित उत्सुकता से बोला। क्योंकि उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उसके पापा किसी ऐसे इंसान को जानते होंगे।
"रविवार को तुम्हें अपने सारे सवालों के जवाब मिल जाएंगे!"वीरसिहं मुस्कुराते हुए बोला।

रविवार को वह अपने पापा के साथ उस व्यक्ति से मिलने उसके घर पहुंचा। उस बड़े से बंगले को देख सोहित हैरान था।थोडी ही देर में एक नौकर ने उन्हें ड्रॉइंगरूम में बिठाया। उस कमरे में अनेक ट्रॉफियां व मेडल लगे थे व उनके साथ एक व्यक्ति की तस्वीर भी थी । वीर सिंह ने उससे कहा  "यह  तस्वीर  देख रहे हो ! यह है उनके बचपन का मित्र रमेश। जिससे मैं तुम्हें मिलवाने लाया हूं ।"
सोहित हैरानी से उनकी ओर देखने लगा।
इतनी देर में एक छोटे से कद व सांवले रंग का व्यक्ति जिसने साधारण सा कुर्ता पायजामा पहना था , बाहर आया और बहुत गर्मजोशी से उनसे मिला।वीर सिंह ने सोहित का परिचय करवाया और उसके प्रोजेक्ट के बारे में बताया। तो वह हंस कर बोले " अरे असली हीरो तो तुम्हारे पापा हैं और तुम मेरा interview    लेने आए हो।
सोहित को लगा कि शायद वो मजाक कर रहे है। इस लिए वो झिझकते हुए बोला " नहीं अंकलजी हीरो तो पापा है ही। लेकिन मुझे ऐसे व्यक्ति का इंटरव्यू लेना है जिसने समाज में अपने दम पर पहचान बनाई हो!"
" तो क्या तुम्हारे पापा ने अपने हुनर व लगन के दम पर समाज में अपनी पहचान नहीं बनाई! जरूरी नहीं है कि तमगे मिले या अख़बार में फोटो छपे। इस में तुम्हारी गलती नहीं है बरखुरदार ! अपितु ये हमारे देश की विडम्बना हैं कि हमारे देश के असली हीरो ऐसे ही गुमनामी के अंधेरो में खोए रह जाते हैं और  उन्हें वो मान सम्मान नहीं मिल पाता जिसके वो असली हकदार हैं।"
उनकी बातें सुन सोहित की आंखें शर्मिंदगी से झुक गई।
तभी चाय नाश्ता अा गया । वीर सिंह और उनके मित्र अपने पुराने किस्सों में मशगूल हो गए और सोहित की आंखे फिर से कमरे का मुआयना करने लगी। तभी उसकी नज़र इन पुरस्कारों के बीच टंगी झाड़ू पर गई। जिस पर फूल माला भी चढ़ी थी। उसे बड़ी हैरानी हो रही थी कि इतने सुन्दर कमरे में उन्होंने ये झाड़ू क्यों लगा रखी है। वह इस बारे में उनसे पूछना चाहता था लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।
रमेश जी ने उसके चेहरे के भाव भाव पढ़ लिए थे।
"सोहित तुम्हारी जिज्ञासा का कारण वो झाड़ू है न!"
सोहित ये सुन थोड़ा झेंप गया मानो उसकी चोरी पकड़ी गई हो। वो बोला "नहीं अंकल ऐसी कोई बात नहीं। मैं तो बस...!"

"यही ना कि ये झाड़ू यहां क्यों टंगी है!तुम पहले इंसान नहीं हो।अक्सर अनजान लोग मुझसे इस बारें में ज़रूर पूछते हैं।तुम्हारे पापा को तो पता है। शायद उन्होंने तुम्हे नहीं बताया होगा।चलो मैं तुम्हारी उलझन दूर करता हूं। ये जो तुम आलीशान बंगला, मान सम्मान देख रहे हो।वह सब इसकी बदौलत ही है।।"
"एक झाड़ू की वजह से? मैं समझा नहीं अंकल!" सोहित हैरानी से बोला।
रमेश जी ने वीर सिंह की ओर मुस्कुराते हुए देखा और बोले " बेटे मैं जिस समाज से आता हूं। उन लोगों का पेशा साफ़ सफ़ाई करना है। मेरे पिता एक सफ़ाई कर्मचारी थे और मां लोगो के घरों से कूड़ा उठाती थी। उस समय शायद ही हमारी बिरादरी में किसी ने अपने बच्चों को पढ़ाने की सोची हो ।किन्तु मेरे माता पिता ने हम बहन भाइयों को स्कूल भेजा। तुम्हारे पापा को तो पता ही है, उस समय गांवो में छुआछूत कितनी फैली हुई थी।बच्चे मुझे अपने पास नहीं बैठने देते थे। न ही मुझसे बात करते। तब तुम्हारे पिता ने आगे बढ़ मुझसे मित्रता का हाथ बढ़ाया। ये बात  मैं कभी नही भूल सकता। हम दोनों ही पढ़ाई में एक दूसरे की खूब मदद करते थे। बारहवीं तक हम साथ पढ़े।लेकिन तुम्हारे दादाजी की मृत्यु के कारण इसे बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी नहीं तो आज ये भी किसी उच्च पद पर होता। इसके बाद मैने कॉलेज में एडमिशन लिया। सफर इतना आसान नहीं था। मेरी काबिलियत की सभी तारीफ करते लेकिन जैसे ही उन्हें हमारे काम धंधे के बारे में पता चलता मुझे हेय दृष्टि से देखने लगते। लेकिन मैने मन में ठाना हुआ था कि कभी भी अपने माता पिता के पेशे को किसी से नहीं छुपाऊंगा। अगर मैं ऐसा करता हूं तो उनके काम व संघर्ष का  इससे बड़ा अपमान हो ही नही सकता था और इसका अर्थ तो यही होता न कि और लोगों की तरह मैं भी इस काम को बुरी नजर से देखता हूं। मेरा मानना था कि कोई भी काम छोटा नही होता। छोटी होती है लोगों की सोच! इसलिए मैं लोगों की बातों को नजरंदाज कर आगे बढ़ता रहा। बस मेरे मन में एक ही धुन सवार थी कि जो लोग आज हमे हीन नज़रों से देखते हैं, कल वो हमारी मेहनत व काम को भी सम्मान दे क्योंकि शिक्षा केवल अमीरों की थाती नहीं अपितु इस पर सब का अधिकार है। आज इसी शिक्षा व अपने माता पिता के अथक परिश्रम व आशीर्वाद से मैने उनके सपने को साकार कर दिखाया है। मैं आज भी अपने ऑफिस में खुद सफ़ाई करता हूं और इसे करने में मुझे कोई शर्म नहीं। साथ ही हर सप्ताह अपने गली मोहल्ले में सफ़ाई अभियान चलाता हूं । जिसमें सभी लोग बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। अब तो तुम्हें अपने सवालों का जवाब मिल गया होगा। हां ये मुझे नहीं पता कि तुम्हें अपने प्रोजेक्ट के लिए इस से कुछ मदद मिल पाएगी या नहीं।"
"नहीं अंकल, मुझे अपने project के लिए एक नहीं दो कहानियां मिल गई है और दो असली हीरो !"
"दो हीरों!" वीर सिंह ने  पूछा।
"हां पापा। पहले हीरो आप है। और दूसरे अंकल। मुझे माफ़ कर दो पापा।  मैने आप का दिल दुखाया है।"
"नहीं बेटा तुम्हे अपनी गलती का अहसास हो गया इससे बढ़ कर मेरे लिए कुछ नहीं और अभी तो तुम कच्चे मिट्टी के घड़े सरीखे ही तो हो ।" उन्होंने प्यार से सोहित के सर पर हाथ रखते हुए कहा।
यह कहानी उन युवक युवियों के लिए एक छोटा सा संदेश देती है जो गांव या छोटे कस्बे से बड़े शहरों में अपने सपने पूरे करने आते हैं किंतु यहां की चकाचौंध में अंधे हो अपनी जन्मभूमि, जन्मदाताओं के जीवन संघर्षों को भूल उनको व उनके  काम धंधों को ही हेय दृष्टि से देखने लग जाते हैं।
सरोज ✍️
स्वरचित व मौलिक

#myfathermyhero

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