मेरी बहु मेरे पदचिन्हों पर नहीं चलेगी

मेरी बहु मेरे पदचिन्हों पर नहीं चलेगी

महिला संगीत में नई नवेली दुल्हन निशा को देख बुआ सास विमला जी का मुंह बना हुआ था क्योंकि निशा ने घूँघट नहीं किया हुआ था| बस नाम के लिए जूडे़ पर ही पल्लू रखा हुआ था| विमला जी ये बात झेल नहीं पा रही थी क्योंकि उनकी भाभी सरिता जी और वो खुद अभी तक गर्दन तक घूँघट करते हैं अपने बडे़ बुजुर्गों के सामने| बाहर हॉल में चाचा ससुर ताऊ ससुर सब बैठे हुये थे और उन सबके सामने ऐसे ही चली आई नई बहुरानी| विमला जी टोकना चाह रही थी लेकिन इतने लोगों के सामने कुछ बोल नहीं पाई और जहर का सा घूंट पीकर रह गई| गाने खत्म हुये सब औरते चली गई तो बुआ जी ने सरिता जी और निशा को अपने पास बुलाया और बोली 


"देखो बहुरानी घूघंट करो न करो लेकिन अपने बड़े बुजुर्गों के सामने ढंग से सिर तो ढक ही लिया करो| तुम इस घर में नई हो, यहां के तौर तरीके तुम्हें नहीं पता लेकिन अब हम समझा देते हैं अपने ससुर के सामने ऐसे ही मत घूमना| धीमी आवाज में बात करना, सबका सम्मान करना और अपनी सास के सभी गुणों को अपना लेना| उससे ज्यादा आदर्श बहु कोई नहीं है हमारे खानदान में| अपनी सास के पदचिन्हों पर चलना ठीक है गांठ बाँध लेना अपनी बुआ की बात को| भाभी के गुणों को अपना लेगी तो समाज में बहुत मान कमायेगी सब जगह तारीफ होगी तेरी|" बुआ सास की बात सुनकर सहमी सी निशा ने हां मैं अपना सिर हिला दिया|

 निशा तो कुछ नहीं बोली लेकिन सरिता जी ने कहना शुरू किया " नहीं जीजी मेरी बहु मेरे पदचिन्हों पर नहीं चलेगी और ना हीं आदर्श बहु का टैग अपने ऊपर लगायेगी|इतना आसान नहीं होता आदर्श बहु बनना ये मुझसे और आपसे ज्यादा अच्छे से कोई नहीं समझ सकता|रिश्तेदारी और समाज में मान कमाने के चक्कर में न जाने कितने ही अरमानों का गला घोटा है हमने|कहां अच्छा लगता था हमें भी पेट तक लम्बा घूँघट करना ,गर्मियों में कितनी घुटन होती थी| मुझे आज भी याद है पाचवीं के बाद आगे पढ़ना चाहती थी आप लेकिन गाँव में स्कूल नहीं था और बगल वाले गांव में बाऊ जी ने भेजने से मना कर दिया था और घर बिठा लिया था|मन में आया था आपके लिए लड़ जाऊं सबसे लेकिन इस बडों के मान के चक्कर में ही तो चाहकर भी कुछ ना कर पाई थी मैं|


कितना रोई थी आप और ब्याह कर जब ससुराल गई वहां भी कितना कुछ बलिदान नहीं किया आपने दूसरों को खुश करने के लिए लेकिन कोई खुश हुआ| तीस साल पहले सबसे ज्यादा पढी़ लिखी बहु थी मैं हमारे घर और पूरे गांव की| गांव के ही सरकारी विद्यालय में नौकरी मिल रही थी मुझे लेकिन माँ बाऊ जी ने साफ इंकार कर दिया था कितना दुख हुआ था मुझे उस दिन| फिर आपके भैया का तबादला शहर में हो गया कितना मन था उनके साथ जाने का मेरा लेकिन माँ बाऊ जी ने जाने नहीं दिया था , कितने साल अलग -2 रहे हम|फिर जब इन्होने घर बनवा लिया और माँ बाऊ जी को साथ ले आये तब बसे हम शहर में|

उसके बाद भी पल पल पर अपनी खुशियां कुर्बान की लेकिन मेरी बहु नहीं करेगी जीजी | वो नौकरी भी करेगी  अगर चाहेगी तो और मेरे बेटे के साथ भी रहेगी| वो उस झूठे मान के लिए अपनी इच्छाओं का गला नहीं घोटेगी जो सिर्फ सामने मिलता है पीठ पीछे तो कमियां ही निकाली जाती हैं|जीजी बडो़ का मान सम्मान तो वो बिना सिर ढके भी कर सकती हैं| "


अपनी भाभी की बातें सुनकर  विमला जी की आंखों में से आँसुओं की धार बह रही थी क्योंकि सरिता जी ने उन्हें गुजरा जमाना जो याद दिला दिया था| जो जीवन वो जीती आई थी अब तक सब याद आ गया था उन्हें | निशा अपनी प्यारी सासु माँ के गले से लग गई थी और मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रही थी इतनी समझदार सास देने के लिए| सरिता जी के चेहरे पर सन्तुष्टि के भाव थे  क्योंकि सालों से मन में रखी बातों को बोलकर वह अपने आप को बहुत हल्का महसूस कर रही थी और स्वयं से किये गये वायदे " मेरी बहु अपनी जिंदगी को खुलकर जीयेगी वो मेरे पदचिन्हों पर नहीं चलेगी" को सार्थक करने की पहल करने लगी थी|


दोस्तों, हम आज किसी के घर की बहु हैं तो कल किसी की सास भी हमको ही बनना है| ये हमें ही तय करना है कि आने वाले समय में हमारी बेटियाँ और बहुएं हमारी तरह ही अपनी खुशियों की कुरबानी देंगी या उन्मुक्त होकर अपने जीवन को जीयेगीं| हमें भविष्य में अपनी बेटी और बहुओं को वो माहौल देना होगा जिसमें वो खुलकर सांस ले सकें और अपने सपनों को पूरा कर सके और इसकी शुरूआत हमें अभी से करनी होगी|

प्यारी सखियों आपको मेरे विचार और मेरी कहानी कैसी लगी कमेंट करके मुझे बतायें| ऐसी ही कहानी आगे भी  पढ़ते रहने के लिए आप मुझे फॉलो करें|


धन्यवाद 


आपकी सखी


सीमा शर्मा पाठक 

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