मेरी साइकिल

मेरी साइकिल

वर्ल्ड बाइसिकल डे।
कुछ खास दिन कुछ खास चीजों या बातों की याद दिलवा देते हैं। बात हो रही है साइकिल की तो आइए आपको एक किस्सा सुनाती हूं। 
जब हम छोटे थे तो स्कूल आस पास होता था इसलिए साइकिल की जरूरत नहीं पड़ी। 
मेरे पिताजी हमेशा साइकिल ही चलाते थे तो कभी-कभी दोपहर में जब मौका लग जाता तो उनकी साइकिल उठाकर हम भी गली के चक्कर लगाते। अभी साइकिल चलानी कितनी आई यह एक अलग बात थी।
बीकॉम मैंने अपने शहर में रह कर गवर्नमेंट कॉलेज से किया तो कॉलेज तो हमेशा पैदल ही चले जाते थे इसलिए साइकिल चलाने का वहां भी कभी मौका नहीं मिला तू प्रैक्टिस अभी भी नहीं हुई। 
फिर एक बार महिला दिवस पर कॉलेज की तरफ से साइकिलिंग एक्सपीडिशन रखा गया और अपने स्वभाव के अनुसार कि किसी भी प्रतियोगिता में भाग लेने का मौका तो छोड़ना ही नहीं है, मैंने भी अपना नाम रजिस्टर करवा दिया।
8 मार्च 1996 की शायद बात है और चल पड़े हम साइकिलिंग एक्सपीडिशन पर। आने जाने की दूरी शायद 20 किलोमीटर रही होगी। मैंने भी अपने पापा की साइकिल उठाई और चल दी दोस्तों के संग। थोड़ा गिरते-पड़ते और संभलते जाने का सफर पूरा कर लिया। बहुत अच्छा लग रहा था, साइकिल चलाने का और महिला दिवस पर कुछ खास करने का एक बहुत ही प्यारा सा अनुभव था वह। गाने गाते हुए, महिला दिवस के नारे लगाते हुए, कभी किसी से पीछे छूटते और कभी किसी से आगे निकलते हुए अपनी मंजिल पर पहुंच गए।
और अब वापसी का समय था।
वापसी में क्या हुआ कि मेरी साइकिल की चैन उतर गई, अभी साइकिल तो चलानी थी लेकिन यह किसको पता था कि साइकिल में ऐसा भी कुछ हो सकता है, चैन भी कोई चीज होती है और वो उतर भी सकती है और अगर उतर ही गई तो उसे वापस चढ़ाना कैसे हैं। 
साथ के जो भी दोस्त, मित्र थे वह आगे निकल गए और मेरी साइकिल सबसे पीछे। मैं थोड़ा सा चलती और साइकिल फिर चलने से जवाब दे देती। बड़ी मुश्किल हो गई और मुझे पता ही नहीं था कि हो क्या रहा है। उस पर डर लगने लगा कि कहीं डैडी की साइकिल खराब तो नहीं करदी। 

तभी एक मित्र वापिस आते हुए दिखाई दिया। उसने शायद देखा होगा कि मैं ही पीछे रह गई हूं तो वापस आया। आकर उसने पूछा कि क्या हुआ तो मैंने कहा कि पता नहीं साइकिल चल नहीं रही है और कुछ आवाज भी कर रही है। 
उसने देखकर हंस दिया और कहा "साइकिल चलाने का शौक है तो उसकी टेक्निकल बातों को भी समझना चाहिए। कुछ भी नहीं हुआ था बस चैन उतर गया था और वह मैंने वापिस चढ़ा दिया है। अगर समझना है तो बैठो देख लो अगर दोबारा से ऐसे हो तो तुम ऐसे पकड़ कर दोबारा चढ़ा देना और पैडल को घुमा देना।"
मैंने हंस कर जवाब दिया "बस इतनी छोटी सी बात थी।"
और हंसी हंसी में मैं वापसी का अपना सफर पूरा करके कॉलेज पहुंच गई।
इस तरह से मनाया महिला दिवस और मेरा पहला साइकिल ट्रिप।
आज बेशक मैं कार ही चलाती हूं लेकिन जब तब अपनी बेटी की साइकिल उठाकर शौक पूरा करती रहती हूं।

What's Your Reaction?

like
2
dislike
0
love
3
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0