मेरी जिंदगी संवारी, मुझको गले लगाकर

मेरी जिंदगी संवारी, मुझको गले लगाकर

स्मृति और अपेक्षा दोनों पक्की सहेलियां थीं। उनकी दोस्ती इतनी गहरी थी कि देख कर कोई कह ही नहीं सकता था कि वो बहनें नहीं हैं। जिंदगी की कोई खुशी नहीं थी जो दोनों एक दूसरे से न बांटे और न ही कोई गम था जब दोनों की आँखों में एक साथ आंसू न आयें। दोनों की इस दोस्ती से काफी लोग खुश होते थे, तो बहुत से लोग जलते भी थे। स्मृति एक अच्छी फैमिली से थी, अच्छी मतलब पैसे से तो सामान्य ही थे पर दिल के अमीर थे। उसकी फैमिली में सब खुश ही रहते थे और इसका उल्टा अपेक्षा की फैमिली में कोई खुश नहीं रहता था और वजह थे उसके पापा। अपेक्षा के पापा का स्वाभाव ऐसा था कि अगर वो पांच मिनट भी किसी के साथ बैठें तो लड़ाई हो जाये और जिसके फलस्वरूप अपेक्षा के घर न कोई रिश्तेदार झांकने आता था न पड़ोसी और ऐसे में स्मृति की दोस्ती ही अपेक्षा के लिए सब कुछ थी| अपेक्षा के पापा स्मृति को भी बहुत कुछ बोल देते थे, पर वो कभी बुरा नहीं मानती थी, कभी-कभी तो अपेक्षा को खुद पर शर्म आने लगती थी।

"स्मृति पापा तुमसे ऐसे बात करते हैं तो तुम्हें बुरा लगता होगा ना?" अपेक्षा ने पूछा।

"हाँ क्यों नहीं लगता, आखिर मैं इन्सान ही हूँ, भगवान थोड़ी हूँ" स्मृति ने जवाब दिया।

"फिर भी तुम मेरे घर आ जाती हो?" अपेक्षा ने कहा।

"क्यों तुम क्या चाहती हो कि मैं तुम्हारे घर न आऊँ? अरे मैंने दोस्ती तुमसे की है, तुम्हारे पापा से नहीं समझी!" स्मृति ने कहा तो अपेक्षा चुप हो गई।

जिंदगी अपनी गति से चलती गयी और अपेक्षा और स्मृति दोनों की दोस्ती स्कूल से कॉलेज तक पहुंच गई| काफी चीजें बदल गईं बस नहीं बदला तो अपेक्षा के पिता का स्वाभाव और स्मृति का खुशदिल मिजाज। अपेक्षा और स्मृति दोनों एम एस सी फाइनल इयर में थीं, दोनों का सपना आगे पीएचडी करने का था। वह समय आज के जैसा नहीं था कि बच्चों के हाथ में स्मार्ट फोन और पर्स पैसों से भरी, तब एक एक रूपये गिन के मिलते थे पैरेन्टस से... और पूरा हिसाब भी देना पड़ता था। अपेक्षा और स्मृति के कॉलेज में अचानक से फाइनल एग्जाम से पहले अतिरिक्त फीस की डिमांड की गई, जिसका पूरे कॉलेज ने विरोध किया पर कॉलेज की तरफ से कोई नर्मी नहीं बरती गई और बोल दिया कि अगर फीस नहीं दी एडमीशन रद्द कर दिया जायेगा । अपेक्षा के तो होश ही खराब थे क्योंकि पापा वैसे ही उसकी ज्यादा पढाई के खिलाफ थे और वह खुद की पढ़ाई का खर्च ट्यूशन देकर निकालती थी पर इधर फाइनल पेपर की वजह से उसने सब बन्द कर रखा था और पापा का व्यवहार भी ऐसा नहीं था कि कोई उसकी मदद करता । माँ से पूछा तो उनके पास भी पैसे नहीं थे और उस समय वो दो हजार दो लाख से कम नहीं थे अपेक्षा के लिए, वो बहुत ज्यादा परेशान थी कि तभी स्मृति आ गई ।

" क्या हुआ ? परेशान क्यों हो , सब ठीक है ना ? स्मृति ने पूछा ।

" हाँ सब ठीक है,  बस ऐसे ही बैठी थी और तुम एक्स्ट्रा फीस ले आयी ? अपेक्षा ने पूछा ।

" हाँ यार लाना पड़ा, देखना मेरी बददुआ लगेगी इन कॉलेज वालों को,  लूट मचा रखी है और तेरा क्या हुआ? स्मृति ने पूछा।

"कुछ नहीं पापा तो पहले ही फेवर में नहीं थे कि मैं पढूं और फीस मांगने पर भड़क गए,  पैसे तो नहीं मिले बातें अलग सुना दी । सब जगह कोशिश करी पर किसी ने भी मदद नहीं की " कहते हुए अपेक्षा की आँखो में आंसू आ गये और वो नीचे देखने लगी ।

" तुम मुझसे नहीं बता सकती थी एक बार, अब क्या होगा? स्मृति ने कहा।

"कुछ नहीं होगा बस मैं शायद इस बार इक्जाम न दे पाऊं , मैंने प्रिन्सिपल मैम से भी बात की पर उन्होंने कहा है कि अब कुछ नहीं हो सकता है और आधे घंटे बाद एक एक के बुलायेंगे और फीस लेंगे । जो पैसे नहीं देगा उसका एडमीशन रद्द कर दिया जायेगा । शायद मेरा सफर यही तक था" अपेक्षा ने कहा।

"चुप करो ज्यादा डायलाग मत मारों देखो मैं कुछ जुगाड़ करती हूँ  , अस्सी लड़कियां हैं अगर तीस - तीस रूपये भी देंगी तो भी फीस भर का हो जायेगा " स्मृति ने कहा और  चली लड़कियो के पास और अपेक्षा वही सर नीचे झुकाए बैठी रही क्योंकि उसे पता था कि कुछ होने वाला नहीं है । स्मृति ने उस दिन जिंदगी का एक कड़वा सबक सीखा कि बड़ी बड़ी बातें करना आसान है पर जरूरत पर मदद करना सबके बस की बात नहीं है । स्मृति पूरे  समूह में भीख सी मांगती घूम रही थी पर मुश्किल से दस लडकियो से ज्यादा किसी के दिल में दया नहीं जगी । कुछ तो ऐसी थीं जो कैन्टीन में बैठ कर पैसे उड़ा रही थी पर स्मृति के मांगने पर मना कर दिया तो स्मृति ने उन्हें बहुत सुनाया तो एक ने यहाँ तक कह दिया कि " अगर इतना ही दर्द है तो खुद की फीस अपेक्षा को दे दे , ऐसे सबसे क्यों माँग रही है " । दिल में दर्द और हाथों में तीन सौ बीस रूपये लिए स्मृति ने दूर से अपेक्षा को देखा , अपेक्षा उसी को देख रही थी शायद उसे भी उम्मीद थी कि स्मृति उसकी मदद कर देगी । आँखो मे आंसुओ को छिपाते हुए स्मृति अपेक्षा के पास पहुंची ।

" क्या हुआ? मुझे पता है कि लडकियो ने पैसे नहीं दिये होंगे । देखो तुमने पूरी कोशिश की ना । अब बस बैठ जाओ और मैं अगले साल पेपर दे दूँगी । तुम परेशान न हो " अपेक्षा ने कहा ।

" तुम कुछ ज्यादा ही नहीं बोलती हो अरे पैसे मिल गये हैं । यह ले पैसे  और  देख तेरा शुरुआत में ही नम्बर है तो जाना और मुँह पर फेकना पैसे " स्मृति ने कहा ।

" सच में पैसे मिल गये हैं, मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है। तुमने वाकई में आज मुझपर बहुत बड़ा एहसान किया है " अपेक्षा ने कहा ।

" हाँ बाबा , यह लो पैसे और जाओ , नहीं तुम्हारा नम्बर निकल जायेगा। तुम फीस देकर आओ मैं यही तुम्हारा इन्तजार करूँगी " स्मृति ने अपेक्षा को दो हजार रूपये दिये तो अपेक्षा चौंक गयी ।

" यह तो सौ सौ के नोट हैं " अपेक्षा ने पूछा ।

" हाँ वो चिल्लर मिले थे तो कैन्टीन से बंधवा लिए,  अब तुम्हारे सवाल हो गये हो तो जाओ ज़ल्दी " स्मृति ने कहा ।

अपेक्षा एडमीशन आफिस की तरफ बढी जहां से सबका नाम बुलाया जा रहा था और स्मृति अपने पापा की दुकान की तरफ तेजी से जा रही थी क्योंकि घर दूर था और दुकान थोड़ा पास थी पर बाहर रिक्शा मिलने में पांच मिनट लग गया । स्मृति ने अपेक्षा की मदद तो कर दी थी पर खुद का कैरियर खतरे में डाल लिया था । एक एक मिनट स्मृति के लिए भारी हो रहा था रिक्शा लेकर दुकान पहुंची तो उसके पापा उसे देखकर चौंक गए ।

" स्मृति इस वक्त यहाँ " स्मृति के पापा ने पूछा ।

" हाँ पापा , ज्यादा टाइम नहीं है मुझे जल्दी से दो हज़ार रूपये चाहिए " स्मृति ने कहा । " दो हजार ! सुबह ही तो ले गयी थी,  कहाँ गये वो ? पापा ने कहा ।

" हाँ पापा वो अपेक्षा के पास पैसे नहीं थे तो मैंने उसे दे दिए,  आप मुझे जल्दी से दे दो प्लीज,  नहीं तो मेरा नम्बर निकल जायेगा " स्मृति हाँफते हुये बोली । " तुम पागल हो क्या,  ऐसे कोई करता है , यह लो पैसे और जाओ जल्दी " पापा ने पैसे देते हुए कहा । स्मृति ने पैसे लिए और कॉलेज की तरफ भागी । वहाँ कॉलेज में अपेक्षा ने फीस जमा कर दी और बाहर आकर स्मृति को ढूंढने लगी जब वो नहीं मिली तो कैन्टीन की तरफ गयी जहां कुछ लड़कियां खड़ी थी तो अपेक्षा ने सबको धन्यवाद किया तो सबने बताया उन्होंने पैसे नहीं दिये बल्कि स्मृति इस बात को लेकर यहाँ से झगड़ा कर के गयी है । अपेक्षा के होश खराब हो गये वह वही गिरते गिरते बची । स्मृति ने अपनी दोस्ती के लिए अपना भविष्य दांव पर लगा दिया था और अपेक्षा खुद को माफ नहीं कर पा रही थी कि क्यों उसने स्मृति को अपनी समस्या बताई । कॉलेज में पी एल्फाबेट की लडकियों को बुलाया जा रहा था , पन्द्रह लडकियो के बाद स्मृति का नम्बर था पर स्मृति का कोई अता पता नहीं  । अपेक्षा की सांसे स्मृति के इन्तजार में रूकी जा रही थी वो खुद को कोसे डाल रही थी , एक एक रोल नम्बर उसकी जान निकाल रहा था। जब आठ लडकियो के नाम बचे तो अपेक्षा का बी पी डाउन हो गया और वो वही गिर पड़ी । अपेक्षा को उठाकर अन्दर लाया गया और डाक्टर को बुलाया गया । पन्द्रह मिनट बाद अपेक्षा को होश आया तो उसने सबसे पहले स्मृति का नाम लिया और उसे पागलों की तरह ढूंढने लगी।

" तुझे न चैन नहीं है,  इसलिए कहती हूँ कि कुछ खाया कर । देख कैसे गिर गिर पडती है " स्मृति ने कहा तो अपेक्षा दौड़ कर उसके गले लग गई ।

" तुम पागल हो क्या? कोई दोस्ती के लिए ऐसा करता है , अपना कैरियर दांव पर लगा देता है " अपेक्षा एक सांस में बोले जा रही थी ।

" हाँ अगर दोस्त मेरी अपेक्षा जैसी हो तो कुछ भी दांव पर लगा सकती हूँ और तुम ज्यादा न बोलो नहीं फिर से गिर पड़ोगी " स्मृति ने कहा । " तुमने अपनी फीस जमा कर दी? अपेक्षा ने डरते हुए पूछा । " नही,  नहीं कर पाई " स्मृति ने कहा तो अपेक्षा का दिल बैठ गया । " मतलब " अपेक्षा ने कहा ।

" अरे फिर मत गिर पड़ना,  एक बार तो मुश्किल से उठा पाई थी और  फीस कहाँ से जमा करूँगी तुमने बेहोश होकर प्रकिया में ब्रेक जो लगा दिया है वैसे यह तुमने जान बूझ कर तो नहीं किया था " स्मृति ने कहा और  हंसने लगी तभी एडमीशन आफिस से बाबू ने स्मृति को बुलाया और फिर उसने अपनी फीस दी और वापस अपेक्षा के पास आयी । " तुझे क्या लगा कि इतनी आसानी से मैं तेरा पीछा छोड़ दूँगी । मैडम अपना साथ बहुत दूर तक का है " स्मृति ने कहा तो अपेक्षा उसके गले लग गई । स्मृति ने अपेक्षा की सिर्फ़ फीस नहीं दी थी बल्कि उसने दोस्ती का वह इम्तिहान दिया था जिसको देने से पहले शायद सबकी आत्मा कांप जाये । स्मृति और अपेक्षा की दोस्ती सबके लिए मिसाल बन चुकी थी और सब यहीं मानने लगे कि जिंदगी में भले एक दोस्त हो पर हो स्मृति के जैसा , पर खोज जारी है क्योंकि अभी तक तो कोई ऐसा नहीं मिला।

दोस्तों, यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है, बस किसी के जीवन की निजता को मद्देनजर रखते हुए पात्रों के नाम और कुछ घटनाओं में परिवर्तन किया गया है क्योंकि यह कहानी मेरी फेवरेट सीनियर की है जिनके साथ मेरे आज भी बहुत अच्छे रिश्ते हैं और जब यह वाकया हुआ तब मैं भी वहीं थी पर शायद मैं भी उनकी जगह होती तो यह कदम नहीं उठा पाती।

आज वो दोनों बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के बाद विदेश में आगे रिसर्च कर रही हैं। जिंदगी में बहुत संघर्ष के बाद भी उनकी दोस्ती आज भी वैसी ही बरकरार है और उनके बारे में फेसबुक पर अपडेट देखकर मुझे हमेशा याराना मूवी का वो गाना याद आता है कि 'तेरे जैसा यार कहा, कहाँ ऐसा याराना'|

दोस्तों, अपेक्षा और स्मृति की जैसी दोस्ती तो किस्मत वालों को नसीब होती है और अगर यह कहानी पढ़कर आपको भी अपने किसी खास दोस्त की याद आई हो तो कमेन्ट करके जरूर बताएं।

धन्यवाद् 

स्वाति शुक्ला 

#हर एक फ्रेंड जरूरी होता है 

#ब्लॉग लेखन प्रतियोगिता 

#द पिंक कामरेड 

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