मेरी माँ के हाथों का स्वाद

मेरी माँ के हाथों का स्वाद

याद आ गया मुझे मेरी माँ की रसोई का वह मनमोहक जमाना,
खाने के साथ-साथ ढेरों स्मृतियाँ दिलो-दिमाग पर
छा जाना ।

सबको चूल्हे के इर्द-गिर्द बिठा प्यार सच्चाई से
खाना बनाना,
संयुक्त परिवार में भी हर किसी को मनपसंद और गjरमा-गरम खिलाना ।

चेहरे पर हल्की सी कोई शिकन नहीं सिर्फ हँसना मुस्कुराना,
साग,पंजीरी जैसे भारी कामों में डैडी का भी हाथ बँटाना ।

हाथों में स्वाद ऐसा कि हरी मिर्च वाले नमक संग चपाती भी खूब भाना ,
बिना ढेरों मसाले डाले मूँग-मसर में भी शाही पनीर का स्वाद आ जाना ।

मेहमान कोई आ जाए तो दादी का माँ की तारीफों के पुल बाँधना,
खुशी से बनाना-खिलाना - यह देख मेहमानों का उन्हें अन्नपूर्णा बताना ।

थोड़े में ही बरकत खूब इस अंदाज से खाना बनाना और बरताना,
गाय हो या गली का कुत्ता हर किसी का माँ से आस लगाना ।

अपने लिए कभी कुछ सोचा नहीं बस अपनों को ही रजाना ,
वाह!क्या खाना बना है - इतना सुनते ही उनका पेट भर जाना ।

बहुत करती हूँ कोशिश रसोई में भी माँ की परछाई मैं बन जाना ,
पर वह संयम,त्याग,सच्चाई कहाँ से लाऊँ जिसका था हर कोई दीवाना ।

Madhu Dhiman

Pink Columnist - Haryana

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