मॉर्डन दुर्गा का जादू....

मॉर्डन दुर्गा का जादू....

 

                        सच एक स्त्री अनेक रूप को जीती है..। परिस्थिति के अनुसार वो बदल जाती है..। पर अपने नैसर्गिक गुणों को नहीं भूलती। कभी माँ दुर्गा के नौ अवतार तो कभी माँ काली का रूप तो कभी माँ यशोदा तो कभी कुछ और....। ना जाने कितने किरदार निभाती है जीवन  के इस रंगमंच पर..। बेटी, बहन, प्रेयसी, पत्नी,  बहू, भाभी, माँ... चाची, मामी, बुआ ना जाने कितने किरदार है..। पर सबसे अहम रोल माँ का निभाती है..। 

                   वो स्त्री ही होती है,  जो अपनी जान पर खेल कर एक बच्चे को जन्म देतीं है..। फिर उसी दिल के टुकड़े को बहू या दामाद को सौंप देतीं है..। वो स्त्री ही है,  जो हमेशा देते रहने में विश्वास करती है..। सर्वगुण संपन्न होते हुई भी..., हमेशा झुकी रहती है..। ना जाने कितनी प्रतिभा,  जो पति से ज्यादा थी... उनको या तो पति ने या पत्नी ने स्वयं कुचल दिया..। हमेशा सबको आगे देख खुश होती है...। 

                    पति और संतान के लिए... चाहे वो पढ़ी लिखी हो या अनपढ़ हो..., एक आस्था के साथ व्रत रखती है। मकसद यहीं की पति, बच्चे दीर्घ आयु हो, स्वस्थ और प्रसन्न रहे..। पर क्या आपने कभी किसी पति को पत्नी के लिए या बच्चों को माँ के लिए व्रत रखते देखा..। या किसी स्त्री को अपने लिए व्रत रखते देखा है..., नहीं ना...। क्योंकि त्याग, धैर्य, ममता, प्रेम सब औरत में ही होती है .। सबकुछ हजम कर जाना..। चाहे अच्छा हो या बुरा हो .। 

                           वो स्त्री ही है... जिसके बिना समाज अपूर्ण है... पर हमेशा, हर जगह प्रताड़ित होती  रहती है... वो भी स्त्री ही है..। एक मकान को अपने हुनर से उसे घर बना देतीं है..। फिर भी उसे ताने सुनने को मिलते है तुम करती ही क्या हो..., या तुम्हे समझ में नहीं आयेगा... कह उसकी योग्यता को कम आंकना... उसे एक कमी का बोध कराना... बहुत सामान्य बात है..। नारी सशक्तिकरण के इस युग में भी नारी कितना प्रताड़ित होती है... ये वहीं जानती है..। 

                     ये नारी ही है जो एक बार सिंदूर पड़ते ही पति को ही अपना सर्वस्व मान लेती है... ता उम्र वफादार रहती है.. भले ही पति वफादार ना हो..। सीता जी भी स्त्री थी,  जो पति के साथ सारे कष्ट सहने के लिए बनवास चली गई..। यमराज से पति सत्यवान को वापस लाने वाली सावित्री भी स्त्री थी..। तो ममता की मूर्ति यशोदा  मैया भी एक स्त्री ही थी..। वो रानी लक्ष्मीबाई भी स्त्री ही थी,  जिनकी वीरता के चर्चे आज तक होती है..। 

                           इतिहास भरा पड़ा है स्त्री के भिन्न रूपों से..। जरूरत के समय साथ खड़े होने वाली वो स्त्री, ना तो निर्बल होती है ना मोहपाश से अपने कर्तव्यों से विमुख होती है..। कभी पिता के लिए तो कभी पति के लिए तो कभी संतान के लिए... हर जगह शक्ति का रूप ले खड़ी हो जाती है..। अपनी ओर उठने वाली दूषित दृष्टि को जला कर भस्म कर देने की क्षमता रखती है..। 

                  
          माही भी एक स्त्री थी जिसके माँ दुर्गा की तरह कई हाथ है... सुबह पांच बजे उठ कर... योगा भी कर लेती नाश्ता और खाना बना साढ़े सात तक सास ससुर और पति को चाय दे.. बच्चों को बस स्टॉप छोड़ आती.. फिर सबको नाश्ता करा पति और अपना टिफ़िन पैक कर ऑफिस की बस पकड़ लेती..। ऑफिस में भी बच्चों के स्कूल से आने के बाद फ़ोन से अपडेट लेती रहती शाम घर आ चाय बना कर सबकी दे रात के खाने की तैयारी के समय बच्चों का होमवर्क भी करा देतीं..। फिर रात सब डिनर एक साथ लेते..। बच्चों की माँ, टीचर, मित्र  और पति की  सहयोगी, प्रेमिका, और सास ससुर की कभी बहू बन कभी उनकी माँ बन सेवा करती...और ऑफिस में एक जिम्मेदार ऑफिसर..।  माही को देख अक्सर पति नितिन सोच में पड़ जाते... नारी तेरे कितने रूप...। कैसे कर लेती है ये नारियाँ इतने काम एक साथ...। सच अनगिनत रूप और कई हाथ वाली ये जादुई मॉर्डन दुर्गा वंदनीय है..। 

                       --- संगीता त्रिपाठी 


                        

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