मैं निर्रथक रूढ़ियों व व्यर्थ के बंधनों का दास नहीं : मुंशी प्रेमचंद

जब इस रूढ़िवाद से प्रेमचंद स्वयं ग्रसित हुए तो उन्होंने रूढ़िवाद से ग्रस्त समाज को मुक्त कराने का फैसला कर लिया । उन्होंने अपनी कहानी के बालक के माध्यम से यह घोषणा करते हुए कहा कि मैं निरर्थक रूढ़ियों और व्यर्थ के बंधनों का दास नहीं हूँ ।

मैं निर्रथक रूढ़ियों व व्यर्थ के बंधनों का दास नहीं : मुंशी प्रेमचंद

आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद जी को उनके जन्मदिन पर नमन व श्रद्धांजलि । 

साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचंद का योगदान अतुलनीय है । उन्होंने कहानी व उपन्यास के माध्यम से लोगों को साहित्य से जोड़ने का अविस्मरणीय काम किया । प्रेमचंद जी का जब जन्म हुआ , उस समय समाज में धार्मिक व सामाजिक रूढ़िवादिता फैली हुई थी । रूढ़िवादिता यानि ऐसी पुरानी चली आ रही परंपरा जिनका कोई औचित्य नहीं है । जब इस रूढ़िवाद से प्रेमचंद स्वयं ग्रसित हुए तो उन्होंने रूढ़िवाद से ग्रस्त समाज को मुक्त कराने का फैसला कर लिया । उन्होंने अपनी कहानी के बालक के माध्यम से यह घोषणा करते हुए कहा कि मैं निरर्थक रूढ़ियों और व्यर्थ के बंधनों का दास नहीं हूँ ।

धार्मिक रूढ़ियाँ-

सभी जानते हैं कि प्रेमचंद एक महान साहित्यकार थे । आपको बता दें कि महान साहित्यकार होने के साथ-साथ वह एक महान दार्शनिक भी थे। इसी दार्शनिक दृष्टि से उन्होंने धर्म की आड़ में लोगों का शोषण करने वालों को अच्छी तरह से जाँच लिया था । तब उन्होंने यह प्रण लिया था कि वह धार्मिक रूढ़ियों को समाप्त करने का प्रयास करेंगे ।

उन्हें धार्मिक रूढ़ियों का कारण ब्राह्मण और मंदिर ही लगे।  तब उन्होंने धार्मिक रूढ़िवादिता को समाप्त करने के लिए कहानियाँ लिखीं। निमंत्रण , रामलीला, हिंसा परमो धर्म: (मानसरोवर५), मनुष्य का परम धर्म - गुरु मंत्र , बाबा जी का भोग तथा पंडित मोटेराम की डायरी प्रमुख कहानियाँ हैं।  

सामाजिक रूढ़ियाँ-

प्रेमचंद जी ने वैवाहिक रूढ़ियों का सामाजिक रूढ़ियों में ही आंकलन किया है । दहेज प्रथा, विधवा विवाह, बाल विवाह, वृद्ध विवाह, पुनर्विवाह , पर्दा प्रथा, पतिव्रत धर्म आदि रूढ़ियों के बारे में उन्होंने संवेदनशीलता के साथ लिखा है । 

उन्होंने कहानी तेंतर के माध्यम से 'तीन पुत्रों के बाद होने वाली पुत्री अपशकुन' का विरोध किया ।

पीने-पिलाने के बाद होली एक पवित्र त्योहार है तो चोरी रिश्वतखोरी भी पवित्र होनी चाहिए- इस तरह के विचार प्रकट करते हुए उन्होंने होली संबंधी रूढ़ि का विरोध किया।  

आर्थिक समस्याओं के बावजूद भी अतिथि सत्कार को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानने वाली रूढ़ि का भी विरोध किया।

प्रेमचंद के अनुसार स्वर्ग-नरक सब इसी पृथ्वी पर है । जो लोग अपाहिज, कर्तव्यहीन एवं निर्जीव होते हैं केवल वही स्वर्ग-नरक की चिंता करते हैं ।

प्रेमचंद जैसा महान साहित्यकार एवं दार्शनिक यह मानता है कि नेकी और बदी की सबसे बड़ी पहचान व्यक्ति का अपना दिल है । दिल जिस काम को बुरा कहता है वह काम हर हाल में बुरा है और जिस काम को अच्छा कह दे वह काम हर हाल में अच्छा है ।

महान साहित्यकार व दार्शनिक को पिंक कॉमरेड की तरफ़ से विनम्र श्रद्धांजलि ।

मधु धीमान

पिंक कॉलमनिस्ट-हरियाणा

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