मेरी पसंदीदा किताब मन्नू भंडारी रचित आपका बंटी

मेरी पसंदीदा किताब मन्नू भंडारी रचित आपका बंटी

हमारी प्रथम गुरु माँ होती है। जो हमें सबसे पहले बिना शब्दों के भी संवाद करना सीखा देती है। फिर धीरे-धीरे हम तुतलाते, गिरते - संभलते नये - नये शब्द सीखते है। धीरे-धीरे शब्दों का यह भंडार हमें भाषा की समझ कराता है। यह शब्द और नित नयी बातें हम पुस्तकों से सीखते है। पुस्तकें एक गुरु की भांति नया ज्ञान प्रेषित करती है।
वैसे तो सबसे पहली और पसंदीदा किताबों में मुझे प्री प्राइमरी क्लास की पुस्तकें बेहद पसंद है जिनमें बड़े ही कलात्मक ढंग से अक्षरों, शब्दों और जीवन में काम आने वाली बातों को कविताओं में पिरोकर बच्चों को समझाया जाता है। भाषा की समझ इन्हीं किताबों से ही तो शुरू होती है।
पर अगर जीवन के प्रति सूक्ष्म ज्ञान और साहित्य के प्रति रूझान की बात करें तो वह पुस्तक हैं "मन्नू भंडारी जी" की "आपका बंटी"। हिन्दी साहित्य में उस समय यह एम. ए. के कोर्स में थी।
मन्नू जी ने इस पुस्तक में बेहद संजीदा विषय को उठाया है। यह कहानी है एक शादीशुदा जोड़े, शकुन और अजय की। जिनका तलाक हो रहा है। जो एक दूसरे के साथ अब अपनी बची हुई जिदंगी व्यर्थ गंवाना नहीं चाहते।एक शादीशुदा जिदंगी के अलगाव और परिवार के टूटने के पूरे घटनाक्रम में उन दोनों की संतान किस तरह पीसती है और इसका उस मासूम के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है। उसे, बड़ी ही सूक्ष्मता और मनोवैज्ञानिक ढंग़ से मन्नू जी ने उकेरा है।
इस पुस्तक की सबसे पहली ख़ासियत यह है कि बहुत सरल भाषा में लिखी गई है। जो यह सीखाता है कि मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखने के लिये गूढ़ और भारी-भरकम शब्दों की जरूरत कतई नहीं है। सरल शब्दों में भी मनोविज्ञान उकेरा जा सकता है, उसके लिए बस संवेदनाओं को समझने की जरूरत भर है।

एक बच्चा जब जन्म लेता है तब से उसका सबसे अधिक समय माँ के साथ बितता है। लेकिन पिता उसे अँगूली पकड़ कर चलना सिखाता है। माँ अगर प्रेम से औलाद को सींचती है तो पिता उसके ऊपर छत्रछाया बन जीवन की कठिन डगर पर चलने का ज्ञान देता है। परवरिश में दोनों का ही अहम योगदान होताहै। बच्चे के लिये दोनों ही महत्वपूर्ण होते है। हमेशा साथ-साथ रहने वाले माता पिता के बीच तनाव को समझना और उससे डील करना बच्चे के नाजुक मन के लिये आसान नहीं होता। दोनों साथ-साथ घर की जिम्मेदारी बांटते हँसते खेलते अचानक लांछन लगाते नजर आते है तो मन सहम जाता है बच्चे का। अनेकों सवाल जो घुमड़ते रहते है पर जवाब नहीं मिलते। और जब बात तलाक तक पहुँचती है तो दोनों में से किसी के भी  साथ अलग से उसका मन शांत नहीं हो पाता। वह उनके साथ अलग अलग बंट जाता है। 
फिर हमारे समाज के लोग जो खुद के घर के गम भूलकर लोगों के घरों में ताकझाक से बाज नहीं आते। मासूम बच्चों को भी नहीं छोड़ते। कड़वी तीखी बातों से मन छलनी करते है  और घाव देते रहते है। 

मन्नु जी लिखती है, "मुझे लगा कि बंटी किन्हीं दो - एक घरों में नहीं, आज के अनेक परिवारों में साँस ले रहा है-
अलग - अलग संदर्भों में, अलग - अलग स्थितियों में।"

समाज में बढ़ती महत्वकांक्षा और सब कुछ पा लेने की जद्दोजहद में रिश्तों की कीमत कम हो गई है। उस पर महिला अगर आर्थिक रूप से स्वतंत्र है तो वह निर्णय भी अपने बल पर ले सकती है। लेकिन इस स्थिति की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इन बिखरते संबंधों के लिए सबसे कम ज़िम्मेदार और बेगुनाह बंटी ही सबसे अधिक भोगता है। 
  शकुन और अजय के बीच पेंडुलम की तरह झूलते बंटी को अंत में हॉस्टल रहने को मज़बूर होना पड़ता है। 
पूरे उपन्यास में लेखिका ने बंटी के मन को और उसके दृष्टिकोण को सहज और सूक्ष्म दृष्टि से समझाया है। 

इस उपन्यास की एक खास बात मुझे यह भी लगी कि मन्नु जी ने किसी भी पात्र को नकारात्मक नहीं माना। हर पात्र के साथ बखूबी न्याय किया। उन्हीं के शब्दों में, "ज़िंदगी को चलाने और निर्धारित करनेवाली कोई भी स्थिति कभी इकहरी नहीं होती, उसके पीछे एक साथ अनेक और कभी-कभी बड़ी विरोधी प्रेरणाएँ निरंतर सक्रिय रहती हैं। 

अंत में यही कहना चाहूँगी कि इस बदहवास सी चलती ज़िंदगी में थोड़ा ठहर कर समय रिश्तों को भी दे। आपकी दौलत, महत्वाकांक्षाएँ आखिर किस काम की जब इन्हें भोगने के लिए आपका परिवार ही आपके साथ नहीं है। बच्चों को भी अहम सदस्य की तरह मान दे। उनके मन में चलने वाली उथल-पुथल को समय रहते पहचानें । उनके प्रश्नों के उत्तर सही तरीके से देने की कोशिश करें। कोई भी निर्णय लेने से पहले अपने बच्चों को केंद्र में रखें। आर्थिक कमजोरी तो फिर भी समय रहते संभाली ज सकती है। लेकिन मन में हुए घाव और अकेलेपन की त्रासदी कभी भरी नहीं जा सकती। 

मन्नु जी के इस उपन्यास को पढ़कर मुझे लेखन की प्रेरणा मिली। साथ ही रिश्तों को अलग-अगल दृष्टिकोण से समझने की समझ भी। आप से यही गुजारिश है कि पुस्तकें आपके व्यक्तित्व को एक नया आयाम देती है। पुस्तकों का चुनाव ज़रूरत और समझ के साथ करें और अपने व्यक्तित्व को मज़बूत बनाएं। 

धन्यवाद 
अनामिका अनु

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