कवयित्री लेखिका व स्वतन्त्रता सेनानी मेरी प्रिय लेखिका सुभद्रा कुमारी चौहान

सुभद्रा कुमारी चौहान जितना उनको पढ़ा उनके लिये मन में श्रद्धा और सम्मान बढ़ता गया उनसे हिन्दी साहित्य को सीखने की इच्छा और प्रबल हो गई।

कवयित्री  लेखिका व स्वतन्त्रता सेनानी मेरी प्रिय लेखिका सुभद्रा कुमारी चौहान

बुझा दीप झाँसी का जब डलहौजी मन में हरषाया,

राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर बिट्रिश राज्य झाँसी आया।
अश्रूपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई विरानी थी,
बुँदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी।। मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
जब जब ये लाईने अपने कोर्स की किताब में पढ़ती थी इन कवियत्री के बारे में जानने की इच्छा बढ़ती जाती।ये कौन हैं ,क्या ये पद्य ही लिखती हैं ,क्या ये केवल वीर रस से ओतप्रोत कवितायें या लेख लिखती हैं ,,,?  किस समय और काल में इनका जन्म हुआ,, आखिर इतनी सुन्दर रचना इन्होने कैसे गढ़ी,,? क्या महारानी लक्ष्मीबाई के खानदान से कोई संबंध था इनका,,? इन्ही सब लालसाओं को पूरा करने के लिये इनकी जीवनी पढ़ी -सुभद्रा कुमारी चौहान जितना उनको पढ़ा उनके लिये मन में श्रद्धा और सम्मान बढ़ता गया उनसे हिन्दी साहित्य को सीखने की इच्छा और प्रबल हो गई।
  सुभद्रा जी हिन्दी की सुप्रसिद्ध कवयित्री,लेखिका और स्वतंत्रता सेनानी थीं। 1921 में गाँधी जी के असहयोगआंदोलन में भाग लेने वाली वह प्रथम महिला थीं। इनकी जीवनी इनकी बेटी सुधा चौहान ने "मिला तेज से तेज" नामक पुस्तक में लिखी है। 
              सुभद्रा जी का जन्म 16अगस्त 1904 को इलाहाबाद वर्तमान प्रयागराज के निकट निहालपुर नामक गाँव में  रामनाथ सिंह के परिवार में हुआ था।शिक्षा प्रेमी होने के नाते रामनाथ सिंह जी ने अपनी पुत्री को स्वयं की देखरेख में  प्रारम्भिक शिक्षा दी। कहते हैं न -"होनहार बलवान के होत न चिकने पात"।सुभद्रा जी बाल्यकाल से ही कवितायें रचने लगीं थीं।उनकी रचनायें तत्कालीन परस्थतियों और राष्ट्रीयता से ओतप्रोत हैं।1919में खंडवा के ठाकुर लक्ष्मण सिंह के साथ उनका विवाह हुआ और वे जबलपुर आ गईं।पारिवारिक सहयोग से सुभद्रा जी की कलम को और रफ्तार मिली ।
                    सुभद्रा जी के दो काव्य संग्रह और तीन कहानी संग्रह  हिन्दी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं।जहाँ उनके मुकुल और त्रिधारा दो काव्य रचनायें जग विदित हैं वहीं तीनों कहानी संग्रह :बिखरे मोती ,उन्मादिनी, सीधे साधे चित्र बहुत ही खूबसूरत कहानी संग्रह हैं। बिखरे मोती में कुल पन्द्रह कहानियाँ हैं जो हमारे तत्कालीन समाज ,सभ्यता और विचारों को पूणर्तयः दर्शाती हैं।स्त्री हमेशा से समृद्ध  और बहादुर है ये सुभद्रा जी की कहानियों  की विशेषता है।उन्मादिनी में नौ कहानियों को और  सीधे साधे चित्र में चौदह कहानियों को एक सूत्र में सुभद्रा जी ने पिरोया है। पर सुभद्रा जी की प्रसिद्धी का श्रेय जाता है उनकी  कविता झाँसी की रानी को। महारानी लक्ष्मी बाई के गोरों से युद्ध का बहुत ही कम शब्दों में बहुत सटीक चित्रण किया है।
उनकी रचनाओं मे उनकी सहर्दयता बखूबी झलकती है।
धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रंगार नहीं
हाय!गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं
मैं ही हूँ गरीबिनीऐसी जो कुछ साथ नही लायी 
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी
ठुकरा दो या प्यार करो।
ऐसे ही जलियाँवाला बाग में बसंत  की निम्न पंक्तियाँ आज भी नेत्रों को अश्रूपूरित कर देती हैं-
आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं
ओ प्रिय त्रृतु राज! किन्तु धीरे से आना
यह सब करना किन्तु यहाँ मत शोर मचाना।
वीरों का कैसा हो बसंत,बचपन,खिलौने वाला आदि अनेक सुन्दर कविताओं में अपने हृदय के उदगार सुभद्रा जी ने प्रगट किये हैं।
स्वाधीनता संग्राम में अनेक बार जेल यातनायें सहने के पश्चात अपनी अनुभूतियों को सुभद्रा जी ने कहानियों में भी व्यक्त किया है। अमराई ,आहुति,पापीपेट, में  सुभद्रा जी ने बहुत ही सरल व सहज भाषा में देशप्रेम को परिभाषित किया है वहीं मंझली रानी,भग्नावेष,
दृष्टिकोण और ग्रामीणा में एक स्त्री के अनेक रूप वाला भाव चरितार्थ होता है।
       
सुभद्रा जी की राष्ट्रप्रेम की भावना को सम्मानित करने के लिये अभी 2006 को तटरक्षक जहाज़ को सुभद्राकुमारीचौहान का नाम दिया गया है।
संक्षेप में यही कह सकती हूँ कि मात्र तैंतालीस साल की उम्र में  एक कार दुर्घटना में काल का ग्रास(15 फरवरी1948)  बनी सुभद्रा जी ने हिन्दी साहित्य जगत में अपना अमूल्य योगदान दिया ।वह एक सच्ची स्वतंत्रता सेनानी,सफल कवयित्री और सहज लेखिका थीं। भाषा और शैली की सरलता के कारण उनकी रचनायें और कवितायें जनमानस के हृदयतल को स्पर्श करती हैं।
मेरी ओर से ये चार लाईने मेरी प्रिय लेखिका कवयित्री  को समर्पित -
        जनजन को चेताया तुमने घटने न कभी नाम दिया
     जेल यातना लाख सहीं न कलम झुकी न शीश झुका
       नारी को सम्मान मिले लेखनी तुम्हारी बताती है
     हे वीर सुहृदय कवयित्री सारिका तेरा गुणगान गाती है
स्वलिखित -सारिका रस्तोगी
अम्बाला कैंट (हरियाणा)
               

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