ना थप्‍पड़ कोई मजाक है और ना औरत कोई चीज

थप्‍पड़ कुल-मिलाकर एक बढ़‍िया मूवी है। हां कुछ लोगों को यह जरूर लग सकता है कि फिल्‍म में थप्‍पड़ को बतंगड़ बना दिया गया पर ऐसा नहीं है। फिल्‍म तो बस एक जरिया है यह बताने के लिए कि ना थप्‍पड़ कोई मजाक है और ना औरत कोई चीज। प्‍यार हो या फिर शादी किसी भी रिश्‍ते में महिला और पुरुष दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों ही बराबर के हकदार हैं।

ना थप्‍पड़ कोई मजाक है और ना औरत कोई चीज

" ना थप्‍पड़ कोई मजाक है और ना औरत कोई चीज"

  #बॉलीवुड तड़का 
 #ब्लॉग प्रतियोगिता 
  #ThePinkComrade 

 एक आदर्श बहू सुबह होते ही चाय बनाती है, पति को उठाती है, मनपसंद नाश्ता खिलाती है, सास,ससर का ब्लड- सुगर लेवल ,V. P. भी जांच लेती है ,और पति को  हर दिन, मुस्कुराहट के साथ ,नाश्ता कराकर कार तक छोड़ कर आती है..!
'परिवार के लिए औरतों को अपनी इच्छा का त्याग करना पड़ता है। यह हमारी मां ने हमें सिखाया था, उन्हें उनकी मां ने.. और शायद उन्हें उनकी मां ने सिखाया होगा।'' इस सब में एक मां के साथ साथ एक महिला का अंतर्द्वंद्व भी साफ दिखता है। यह अंतर्द्वंद्व उस समाज की वजह से है, जो हर लड़की को सभ्यता, संस्कार, मर्यादा और सुदंरता का पाठ पठाते हैं।
तापसी पन्‍नू की "थप्‍पड़" फिल्म देखकर कुछ ऐसा ही लगा ।यह  एक शानदार फिल्‍म है।यह तो बस एक जरिया है यह बताने के लिए कि" ना थप्‍पड़ कोई मजाक है और ना औरत कोई चीज"।
थोड़ी-थोड़ी कुर्बानियां देते-देते औरत कब एक कठपुतली बन जाती है उसे खुद इस बात का एहसास नहीं होता।और जब पति उस पर हाथ उठाता है तो औरत को लगता है कि ये पति का हक है. ऐसे ही घरेलू हिंसा की शुरुआत होती है।जी हां, अत्‍याचार सहना एक अपराध है. वो अपराध जो कल को आपके या आपकी बेटी, बहू के साथ हो सकता है और कहीं आप ये ना कहती रह जाएं कि औरत को थोड़ा बर्दाश्‍त करना होता है।
 बस एक थप्पड़ ही तो था। क्या करूं? हो गया ना। ज्यादा जरूरी सवाल है ये है कि ऐसा हुआ क्यों? बस इसी ‘क्यों’ का जवाब तलाशती है अनुभव सिन्हा की ये फिल्म थप्पड़।  अमृता (तापसी पन्नू) कैसे अपने पति विक्रम के प्रति समर्पित है। उसके ख्वाबों को पूरा करने के लिए जी जान लगाए हुए है और फिर एक पार्टी में सबके सामने अचानक पति के थप्पड़ से उसके सारे सपने चकनाचूर हो जाते हैं। 
फिर एक औरत की जंग शुरू होती है एक ऐसे पति के साथ, जिसका कहना है कि मियां बीवी में ये सब तो हो जाता है। इतना बड़ा तो कुछ नहीं हुआ ना। 
      फिल्म में एक जगह कहा भी गया है कि अगर एक थप्पड़ पर अलग होने की बात हो जाए तो 50 परसेंट से ज्यादा औरतें मायके में हों।
तापसी के अलावा फिल्म में  पांच और औरतों के जीवन के अंतर्विरोध दिखाए गए है। पांच अलग अलग तबके से जुड़ी इन औरतों के जरिए अनुभव ने औरत की हर तकलीफ को परदे पर उतार दिया।
 एक किरदार तापसी की मेड है जो पति से मार खाने को ही अपना जीवन समझती है, लेकिन तापसी का सफर कैसे उसे हिम्मत देता है उसके स्टाइल में। 
दूसरी औरत तापसी की मां (रत्ना पाठक), जिसकी जिंदगी बेहद सामान्य और अन्यथा बेहतर और प्रोग्रेसिव है और लगातार बेटी को पति से अलग न होने की सलाह ही देती है, लेकिन फिल्म का अंत आते आते वह भी अपने साथ हुए अन्याय को महसूस करने लगती है। 
     तापसी के इस बेहद प्रोग्रेसिव पिता (कुमुद मिश्रा) को तब झटका लगता है जब उन्हें अहसास होता है कि उन्होंने अपनी पत्नी के सपने को कभी जानना जरूरी समझा ही नहीं। 
तीसरा किरदार है, तापसी की अपनी सास (तन्वी आजमी) जो खुद की पहचान ढूंढने के लिए पति से अलग बेटे के साथ रहती तो है, लेकिन जब बहू को अपना बेटा थप्पड़ लगा रहा है तो उस बात को वह यह कहकर अनदेखा करती है कि बेटा परेशान था, हो गया उससे। और अगले दिन भी बहू से उसका हाल पूछने के बजाय ये पूछती है कि विक्रम रात को ठीक से सोया ना?
         चौथी कहानी फिल्म में चलती है तापसी की वकील नेत्रा की, जिसे बेहद दमदार तरीके से निभाया है माया सराओ ने। नेत्रा जयसिंह एक कामयाब वकील होने के साथ साथ मशहूर न्यूज एंकर मानव कौल की पत्नी हैं और बेहद कामयाब वकील की बहू। दो पुरुषों की कामयाबी किस तरह उसके व्यक्तित्व और अचीवमेंट को दबा रही है, इसका अंदाजा तापसी का केस लड़ने के दौरान नेत्रा को होता है और फिल्म के अंत में वह बेहद शालीनता से साहसिक कदम उठाने से नहीं चूकतीं।  
          पांचवा किरदार तापसी के भाई की गर्लफ्रेंड का है जो तापसी के साथ उस वक्त खड़ी होती है जब तापसी का भाई तक उसके फैसले से खुश नहीं है। अपने बॉयफ्रेंड से उसका रिलेशन कैसे मोड़ से गुजरता है, यह भी अपने आप में बेहद पावरफुल तरीके से दिखाया गया है।
फिल्म का बेहतरीन हिस्सा है उसका अंत। यह इसलिए क्योंकि फिल्म देखते रहने के दौरान हमारे सामाजिक ढांचे और हमारी परवरिश के कारण कई बार एक सवाल हमारे मन में आ सकता है कि तापसी क्यों इतनी कठोर हो रही हैं? एक थप्पड के कारण घर तोड़ना सही नहीं है। एक चांस तो दे देना चाहिए।
थप्‍पड़ कुल-मिलाकर एक बढ़‍िया मूवी है। हां कुछ लोगों को यह जरूर लग सकता है कि फिल्‍म में थप्‍पड़ को बतंगड़ बना दिया गया पर ऐसा नहीं है। फिल्‍म तो बस एक जरिया है यह बताने के लिए कि ना थप्‍पड़ कोई मजाक है और ना औरत कोई चीज। प्‍यार हो या फिर शादी किसी भी रिश्‍ते में महिला और पुरुष दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों ही बराबर के हकदार हैं।


 

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