नारी हूं मैं , मेरे रूप अनेक

नारी हूं मैं , मेरे रूप अनेक

नारी हूं मैं
मेरे रूप है अनेक ।
हर रूप हर रंग में ,
हर रिश्ते हर नाते में ,
नाम है मेरे अनेक ।
हर नाम में हूं मै ,
एक नया संदेश ।
नारी हूं मैं ,
मेरे रूप हैं अनेक ।

ईट गारे के बने ढांचे में,
मैं सांसे अपनी देती हूं ।
छूकर दीवारों को,
प्रांण  उनमें भर देती हूं ।
अलग-अलग नामों से ,
मैं रिश्ते कई निभाती हूं ।
मैं मकान को घर बनाती हूं,
 हां , नारी हूं मैं ,
गृहणी मैं कहलाती हूं ।

तन भी कोमल , मन भी कोमल
आत्मशक्ति है प्रबल ।
कोमलता का हूं पर्याय जहां,
सृजन शक्ति है मेरी वहां ।
जन्म लेती हूं मैं जब,
जननी भी जन्म लेती है ।
ममता की गोद में भावी मां खेलती है।
चाहे पुकारो बेटी मुझे,
चाहे मुझे मां कहो,
 हां , नारी हूं मैं,
ममता का साकार रूप हूं मैं ।

धरा सा धैर्य धारण करूं ,
पग पग  पांव जहां धरु । 
कभी पिता के आंगन में ,
कभी भाई की कलाई में,
स्नेह बनकर मैं रहूं ,
मोह का बंधन मै बांधू ।
 हां ,नारी हूं मैं  ,
मनमोहिनी हूं मैं ,
मोह का रूप मै धारण करुं ।

धूप समय की तेज बड़ी,
मैं शीतल छांव बनती हूं ।
सिली ठंडी रातों में,
मैं ऊष्मा बंन दहकती हूं ।
चाहे पथ हो पथरीला ,
या पुष्पों से राह भरी हो
संग संग मै चलती हूं ।
थाम लूं जो हाथ मै,
सातों वचन निभाती हूं।
  प्रिया हूं मैं ,
हां  नारी हूं मैं ,
अर्धांगिनी मैं ही बनती हूं ।

सुंदरता प्रेम की मुझसे है ,
कवि की कविता मुझसे है
कभी प्रेयसी बनके,
गागर प्रीत की छलकाती हूं ।
कभी प्रेरणा बनके ,
विजय तिलक बन जाती हूं ।
हां नारी हूं मैं ,
प्रेम का आधार हूं मैं ।

सोलह कलाएं अंग बसी,
सोलह श्रृंगार से सजी,
चातुर्य और माधुर्य से भरी ,
साहस और संघर्ष से बनी,
कामिनी,  मैं हूं दामिनी ।
मन से हूं सागर से बड़ी,
इच्छाएं है उफनती पहाड़ी नदी ,
भाव मेरे मन के हैं ऐसे,
झील में पड़ते भंवर  हो जैसे ।
स्वप्न में लिपटा सत्य हूं मैं ,
माया का साकार रूप हूं मैं ।
हां नारी हूं मैं,
मेरे रूप है अनेक  ।
हर रूप में हूं मैं
एक अनोखा संदेश ।
मान  हूं ,सम्मान हूं ।
ईश्वर का वरदान हूं ।
सृष्टि और सृजन का मेल हूं मैं  ।
हां नारी हूं मैं ।

रचना - तुलिका दास ।
# स्त्री तेरे रूप अनेक ।

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