नफरत के सौदागर

नफरत के सौदागर

महान कवि श्री श्री श्री अर्नबदास जी के दोहे, शांति के साथ पढ़िए और आनंद लीजिये 

ऐसी वाणी बोलिये,  जम के ग़दर होये ,
दस बारन के सर फटे,तो मीडिया को सुकून होये ,

दिल्ली मैं बैठा पत्रकार, करे ललकार ,सर फटे,डंडा पड़े, बहे लहू की धार,
तुम अपना दिमाग मत लगाना वीर, बस बंद आंख,  करते रहना वार, 

एकता भुला, चाकू निकालिये  अकेली जबान नहीं साब  , थोड़ी आग भी निकालिये 
जनानी रोवे चाहे,  छाती पीट पीट,पर वीर, तुम न दिखाना अपनी पीठ 

लाठी संग, निकले कट्टा,और गोली चले धाए धाए, 
निकले नेक हाड़-मांस , धरा पूरी, लाल रंग जाए,

अनाज उगलती ये मातृ धरा ,जब और रक्त न पी पायेगी ,
धर्म तुम्हरा तभी बचेगा ,तभी शांति आएगी ,तभी शांति आएगी ,


हमें बरगला ये दलाल, रोज मलाई खाएंगे
भाई को भाई से लड़ा , खूब पैसे कमाएंगे 

टीवी पर चिल्लाते इन भेडियो का ,
टीवी पर चिल्लाते इन भेडियो का ,
न कोणु बाप हैं ,  और न ही इनकी कोनू मैय्या ,
the whole thing is that ,के भैया सबसे बड़ा रुपैया |

इस कविता का हालिया घटित किसी घटना से कोई सरोकार नहीं हैं , बाकी आप समझदार हैं | 



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