नव वर्ष और यादें।

नव वर्ष और यादें।

कुछ मास हुए जब नव वर्ष आया था, 
अलबेली संध्या का उत्साह सब और छाया था । 
बहुत सारी उम्मीदों- आशाओं के साथ- 
हम सबने मिलकर नया साल मनाया था।। 

क्या मालुम था अपने साथ और क्या लाएगा, 
कैसे कैसे मानव जीवन की मुश्किलें बढ़ाएगा।  
प्रकृति दिखाएगी विकराल रूप अपना कहीं- 
तूफान, आग, पानी या भूकंप से सब हिल जाएगा।। 

धर्म जाति के नाम पर होंगे रोज़ दंगे और फसाद, 
अस्तित्व की लड़ाई में मनुष्य खुद को करेगा बर्बाद। 
नर नारी, बच्चे बुजुर्ग सब आ जाएंगे सड़कों पर -
जलती दिखेंगी हर तरफ थी जो बस्तियां आबाद।।   

यूँ तो बीमारिया आती रहीं है बारम्बार, 
पर अबके महामारी ने बंद कर दिए सब कारोबार।  
मनुष्य है बंद घर में थम गई है भागदौड़- 
रूक गई विश्व भर में जैसे जीवन की रफ़्तार।। 

आधा साल बीता और कितने खड़े हो गए सवाल,
आपा धापी हर तरफ खड़ा दिखे कोई नया बवाल।  
हे वर्ष बाकी के दिन अब तूं शुभ समाचार ही लाना- 
इतिहास बनो तो पन्नो पर कुछ मीठी यादें भी लिखवाना।।

What's Your Reaction?

like
2
dislike
0
love
2
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0