नोनी का साग

नोनी का साग

 हमारी देश की सभ्यता और संस्कृति बहुत उच्च  है ।यहाँ कई बातें  समाहित हैं जिन्हें हम मानते हैं और उनका हर पल आदर करते हैं। कई पर्व है जो केवल आस्था और विश्वास पर निर्भर होते हैं। जिनका पालन हम बहुत श्रद्धा से करते हैं। ऐसी कई बातें हैं जो हमारे दिलों में बसी रहती है।

 बिहार, बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश में जितिया व्रत बहुत श्रद्धा और परंपराओं के आधार पर किया जाता है ।यह व्रत महिलाएँ संतान की लंबी आयु के लिए रखती हैं। ऐसा माना जाता है कि जो महिलाएँ इस व्रत को रखती हैं उनके बच्चों के जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और उन्हें संतान योग नहीं सहना पड़ता है ।
यह व्रत निर्जला रखा जाता है। माताएँ पानी भी ग्रहण नहीं करती है ।संतान के सुखी और स्वस्थ जीवन के लिए निर्जला  व्रत सकती है ।जितिया के एक दिन पहले हर माँ मड़ुवा (रागी) के आटे की रोटी,सतपुतिया और नोनी के साग से बनी सब्जी से पर्व की शुरुआत करती है। साल में एक ही बार यह खाने को मिलता है इसलिए हम बहुत खुश रहते थे ।यह खाने के बाद ही दादी और मम्मी चाय पानी पीती थी और अगले दिन निर्जला व्रत रखती थी ।नोनी का साग हर जगह गमले, जमीन या जंगल में कहीं भी उग जाता है ।साल भर इसे कोई नहीं पूछता पर जितिया के दिन यह ₹100 किलो तक मिलता है। सतपुतिया जिसे हम खाना नहीं चाहते उसे भी हम बड़े चाव से खाते हैं ।पूजा के दिन जीमूत वाहन की कुश से निर्मित प्रतिमा को धूप, दीप ,चावल पुष्प आदि से पूजा जाता है ।मिट्टी तथा गाय के गोबर से चील और सियारिन की मूर्ति बनाकर उनके माथे पर लाल सिंदूर का टीका लगाया जाता है। इनकी भी कथा कही जाती है।किस प्रकार चील ने जितिया पर्व के नियमानुसार व्रत रखा,कथा सुनी और अपने बच्चों को दीर्घायु बनाया।  फिर हम जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनते हैं। हमारे यहाँ सूर्य भगवान को अर्घ्य  भी देते हैं ।
अगले दिन दूध और चने के साथ दादी और मम्मी पारण करती थी ।फिर हमें प्रसाद मिलता था। शाम में पंडित जी को दान और दक्षिणा दे आते थे ।उस दिन खाने में चावल, दही ,बचका, नोनी का साग और टोरा बनता है ।कहते हैं बच्चों को खिलाकर माँ  खाती है ।उस दिन भी पापा दादी के साथ खाते और हम मम्मी के साथ। टोरा चने की सब्जी होती है ।बस चावल के आटे को घोल कर उस में डाल दिया जाता है। जिससे स्वाद दुगना हो जाता है ।पर यहाँ बनारस में नोनी का साग नहीं मिल पाता। जब भी यह पर्व आता है  मुझे बहुत याद आती है अपने शहर।   मुझे याद है कॉलेज से लौटते समय मैं  खरीद कर लाती थी कि कहीं कम न पड़ जाए। कभी मायके जाने का मौका नहीं मिला इस मौके पर ।बहुत याद आती है मायके की और नोनी के साग की ।वह स्वाद आज भी याद है।

जीमूतवाहन हर बच्चे को स्वस्थ और दीर्घायु बनाएँ।आप भी पटना जाएँ तो जितिया के समय इस साग का आनंद जरूर लें ।

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डाॅ मधु कश्यप 

#मेरे शहर से जुड़ी मेरी यादें 

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