नये ज़माने की नयी सोच

दादी आश्चर्य की बात है, नव दुर्गों को पूजने की बात जहाँ एक ओर कही जाती है ..घर घर कन्याएँ पूजी जाती हैं और वहीं इन पंक्तियों का पाठ कर हम पितृसत्ता की सोच को इस ज़माने में आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे

नये ज़माने की नयी सोच

दादीमाँ सुंदर कांड का पाठ कर रही थी।..मधू दादीमाँ पास ही बैठी थी ,दो माह माह बाद उसका विवाह था ।बीच- बीच मे दादी माँ उसे चौपाइयों के अर्थ भी बताते जा रही थी।अचानक से वो ही विवादित चौपाई आ गयी।अब दादी माँ उसे लगी अर्थ बताने।मधू से रह नहीं गया और वो पलट के बोली -"दादी आश्चर्य की बात है, नव दुर्गों को पूजने की बात जहाँ एक ओर कही जाती है ..घर घर कन्याएँ पूजी जाती हैं और वहीं इन पंक्तियों का पाठ कर हम पितृसत्ता की सोच को इस ज़माने में आगे बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। स्त्री को ताड़ने का अधिकार हमेशा से पुरुष ने अपने हाथों में चाबुक के रूप में ले कर  रखा है क्या ??जितना तेज़ चाबुक चलेगा उतनी ही तेजी से गृहस्ती रूपी घोड़ा तेजी से दौड़ेगा।और पुरुषों की इस घटिया सोच को आगे बढ़ाने का कार्य किया ...किसी अन्य पुरुष ने नहीं बहनों हम स्वयं महिलाओं ने..माँ के रूप में कि-"बिटिया अब पति ही तुम्हारे स्वामी हैं..उनकी आज्ञा का पालन करना तुम्हारा कर्तव्य हैं...प्रतिदिन सुबह उठते ही उनके चरण स्पर्श करना..सबसे पहले भोजन उन्ही को कराना.. और बाद में बचा खुचा तुम खाना...रात को स्वामी के पैरों को दबाना ..पंखा झलना...कभी तुमसे गलती हो जाय तो पैर पकड़ का माफी मांगना... उनके साथ बराबरी मत करना..हमेशा उनसे एक कदम पीछे ही चलना..पत्नी सुख उन्हें देते रहना..." और भी बहुत सी बातें है जिनकी सीख केवल माँ द्वारा बिटिया को दी जाती है"।दादी की आँखे खुली रह गयीं।मधू फिर बोली-"दादी हम लोग तो भाग्यशाली हैं जो पुरुषों से एक कदम पीछे  नहीं उनके कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे है।उनके पैरों में पड़ कर नहीं उनसे हाथ मिलाने की कुव्वत रखते हैं...पत्नी सुख ही नहीं पति सुख की बात भी करते हैं..उनके बाद नहीं उनके साथ खाना खाने की बात करते हैं।और गलती होने पर यदि उस ओर से है तो सॉरी कहलवाना और खुद की है तो भी सॉरी कहना जानते हैं।और खुद के थके होने पर पति से सहायता की अपेक्षा रखते तो है।और कभी कभी मुझे लगता है कि पुरुष तो शुरूवात से ही  बेचारा और अबोध प्राणी रहा है क्योंकि ये सभी बातें उसने खुद नहीं सीखी ..उसे समाज ने और खुद महिलाओं ने जबरदस्ती ये सिखायाईं हैं"।.मधू ने अभी अपनी बात पूरी ही की थी। दादी लगी ताली बजाने और बोली -"सही बात बिटिया ,हमने तो कभी ऐसा सोचा ही नहीं..तुमने तो बिल्कुल सच कहा है ,गृहस्ती रूपी गाड़ी के स्त्री,पुरुष ही तो पहिये होते है।इसलिए उनके बराबर साथ देने से ही तो ये गाड़ी आगे बड़ेगी।आजकल के बच्चो की बहुत बढ़िया सोच है पैरों में पड़ कर नहीं हाथ मिलाने की बारी है..काश हमारे ज़माने में भी ऐसी सोच होती"।
दोस्तो  कैसा लगा ये ब्लॉग।।

आपकी स्नेह
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