पाप और पुण्य की अनूठी कहानी...

पाप और पुण्य की अनूठी कहानी...

     चित्रलेखा भगवतीचरण वर्मा जी का प्रसिद्ध उपन्यास है जिसकी विषयवस्तु प्रत्येक काल में प्रासंगिक रहेगी। चित्रलेखा उपन्यास की कथा पाप और पुण्य पर आधारित है, लेखक ने मानव स्वभाव का बहुत ही भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है जो लेखक की मानवीय व्यवहार के प्रति उसके दृष्टिकोण और उसकी गहन वैचारिक प्रतिभा को दर्शाता है। इस कथा को पढ़ते समय मन में अनेक भाव आते जाते रहते हैं मानव स्वभाव के नये-नये रूप देखकर आश्चर्य होता है। पाप और पुण्य की परिभाषा बदलती हुई महसूस होती है बहुत ही रोचक तरीके से कहानी का तानाबाना लिखा गया है। एकबार पढ़ना शुरू करने पर उत्सुकता बढ़ती ही जाती है।
     चित्रलेखा कथा की नायिका है जो नगर की एक मशहूर नृत्यांगना है और बेहद खूबसूरत है। उसी के चारों तरफ उपन्यास की कथा घूमती रहती है। बीजगुप्त, कुमारगिरी, श्वेतांक, यशोधरा आदि प्रमुख पात्र हैं जिनके माध्यम से कथा को विस्तार मिलता है और पाप पुण्य की अवधारणा का नया रूप नयी सोच के साथ प्रकट होता है। गुरु रत्नांबर अपने दोनों शिष्यों को पाप और पुण्य की खोज करने के लिए बीजगुप्त और कुमारगिरि के यहाँ भेजते हैं। कुमारगिरि एक योगी और तपस्वी है उसे अपने ज्ञान और योग पर बहुत दर्प होता है दूसरी तरफ बीजगुप्त एक ऐसा युवक है जिसके लिए जीवन का आनंद ही सब कुछ है वह हर पल राग रंग में ही डूबा रहता है। इन दोनों के जीवन में चित्रलेखा का प्रवेश होता है दोनों ही उसके प्रेम करने लगते हैं। चित्रलेखा बीजगुप्त से बहुत प्रेम करती है लेकिन यशोधरा के विवाह का प्रस्ताव बीजगुप्त के लिए आने पर वह उसे विवश करती है कि वह यशोधरा से विवाह कर ले, उसके लिए यही उचित होगा लेकिन बीजगुप्त इंकार कर देता है कि वह चित्रलेखा के अतिरिक्त किसी से प्यार नहीं कर सकता। चित्रलेखा बीजगुप्त को छोडकर कुमारगिरि के पास चली जाती है। यहाँ उसे कुमारगिरि के एक नये रूप के दर्शन होते हैं जो चित्रलेखा पर मोहित है यह देखकर उसे बहुत आश्चर्य होता है। उधर हमेशा भोग विलास में लगा रहने वाला बीजगुप्त चित्रलेखा के जाने के बाद सारा एश्वर्य छोड़कर भिखारी बन जाता है। इधर कुमारगिरी के पतन से आहत चित्रलेखा बीजगुप्त के बारे में जानकर उसे भिखारी बनकर जाने से रोकना चाहती है लेकिन उसके न मानने पर स्वयं भी उसके साथ चल देती है। इस उपन्यास में मानवीय व्यवहार में परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तन होते हुए दिखाया गया है। श्वेतांक और विशालदेव भी अपने-अपने स्वामियों में हुए बदलाव को देखकर चकित रह जाते हैं।
     इस पुस्तक की कथावस्तु और मानवीय स्वभाव की व्याख्या को घटनाक्रमों द्वारा इतने प्रभावशाली तरीके से वर्णित किया गया है कि आप सोचने पर विवश हो जायेंगे कि  वास्तव में पाप और पुण्य की अवधारणा क्या है? क्या भोग विलास में लिप्त व्यक्ति ही पापी होते हैं? क्या योग साधना किसी को इतना मजबूत बना देती है कि वह मानवीय कमजोरियों पर पूर्णतः विजय पा सकता है ? अपने इसी गुण के कारण यह उपन्यास मुझे बहुत अच्छा लगा कि आप इसको पढ़ने के बाद एक तरफ रखकर विचारमुक्त नहीं हो सकते आपकी संवेदना और आपके हृदय को पाप और पुण्य इन दो शब्दों पर पुनः विचार करने को प्रेरित करता है यह।
     यह लोकप्रिय उपन्यास कई भाषाओं में उपलब्ध है और इसकी कथावस्तु समय सीमा से परे है, इस उपन्यास पर एक प्रसिद्ध फिल्म भी बनी है।

~सुमेधास्वलेख,
स्वरचित, मौलिक।

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