नींद से जागिये !

नींद से जागिये !

अब कहाँ लड़कियों को दहेज़ के बदले बेचा जाता है या लड़कों को खरीदा जाता है ! अब कहाँ होते हैं बाल विवाह ! अब कहाँ कोई आदमी औरत पर हाथ उठाता है ! अब तो लड़कियां मन चाहा वर चुन सकती हैं , ऑनर किलिंग अब नहीं होती। दांपत्य जीवन में गर कोई कमी रह जाती है ,तो अब समाज औरत को दोष नहीं देता , ये तो बरसों पहले की दक़िया नूसी बातें हैं ! अब तो शादी के बाद शारीरिक सबंध पुरुष औरत की रज़ामंदी से ही बनाते हैं , अब ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं होती। अब समय बदल गया है या बदल रहा है ! !

जिसे ऐसा लगता है की लड़कियों के साथ अब कोई  भी नाइंसाफी नहीं होती , वो सच्ची कहानियों पर आधारित बॉलीवुड की एक फिल्म ज़रूर देखे - "Parched " . मैं महिलाओं की स्वंत्रता का पैमाना अपनी ज़िंदगी को कभी नहीं मानती। मैं स्वंत्रत हूँ और निडर भाव से अपना जीवन जीती हूँ , इसका अर्थ ये निकालना की औरतों के लिए समय और परिस्थिति बदल रही है,  ये मानना हास्य का पात्र बनने जैसा है। 

ज़्यादा दूर नहीं जाना चाहूंगी , जब अपने ही आस पास की लड़कियों और महिलाओं के साथ उठती बैठती हूँ , जो किसी गांव या छोटे शहर नहीं बल्कि मुंबई , बैंगलोर ,दिल्ली जैसे मेट्रो सिटी में रहतीं हैं , तब महसूस होता है - बरसों  पहले से बद्द्तर हालात होते जा रहे हैं महिलाओं के लिए। आपको उन्हीं में से कुछ महिलाओं की ज़ुबानी कुछ बातें बताती हूँ -

- दुनिया भर के हुनर जानने वाली औरत को घर से बाहर काम नहीं करने दिया जाता ,ये कहकर कि पति अच्छा कमा रहा है ,तुम बस गर्म गर्म रोटियां खिलाओ। बाहरी दुनिया से वो ज़रा सा भी रूबरू होना चाहे तो आज के इस बदलते समय में , २१स्वीं सदी में , उसे एक स्मार्ट फ़ोन तक नहीं रखने दिया जाता।

- बच्चे में कुछ कमी हो या कमज़ोर हो तो सबसे पहला दोष माँ के सर पर सजा दिया जाता है , तुमने प्रेगनेंसी में ये नहीं किया , तुमने लापरवाही की। ये सारे ताने आज भी सिर्फ एक औरत ही सुनती है। 

- अगर बाहर जाकर अपना नाम कमाना चाहे तो ,उसके सामने पहले ही कायदे कानूनों की इतनी लम्बी लिस्ट रख दी जाती है कि शायद 50 प्रतिशत महिलाएं जो हुनर रखती हैं , वो घर से निकल कर कोई गलती ना हो जाये इसलिए खुद को ही कैद कर लेती हैं।  

नौकरी करो चाहे कुछ करो ,खाना समय से बनना चाहिए !नौकरी करो या कुछ करो  , बच्चे की परवरिश ज़रा सी भी ऊपर नीचे न हो।  नौकरी करो पर परिवार को मत भूल जाना ! नौकरी करो या कुछ करो , घर समय से ही वापस आ जाना।  रास्ते में ट्रैफिक ज़्यादा हो  या मीटिंग के लिए देर तक रुकना हो , दोष 99 प्रतिशत औरतों के सर ही रखा जाता है। 

हालांकि  फिल्म "Parched" राजस्थान के दूर किसी क्षेत्र की मालूम होती है , बाल विवाह , ज़बरदस्ती शारीरिक सम्बन्ध बनाने का ज़ोर , शादी के नाम पर लड़की को खरीदने के प्रथा , दांपत्य जीवन की कमी का दोष औरत के सर मढ़ने की कहानी , बाल विधवा के जीवन का संघर्ष , उसकी इच्छाएं जैसे अहम मुद्दों पर रौशनी डालती ये फिल्म " सजीव अनुभवों का चित्रण है। जहाँ आज भी औरतें तिल तिल मरकर जी रहीं हैं। 

अगर इसके बावजूद भी आपको लगता है की समय बदल रहा है , औरतों की दशा सुधर रही है ! तो आपको नींद से जागने की सख्त ज़रूरत है।  आँख बंद कर लेने से अँधेरा मिटता नहीं !

कड़वा सच लिखिए , लिखते रहिये , किसी के मन को ज़रूर चुभेंगे आपके शब्द और शायद किसी एक औरत / लड़की का जीवन संवर जाये। 

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