पारिजात एक प्रेमकथा अंतिमभाग

पारिजात एक प्रेमकथा अंतिमभाग

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----------पारिज़ात--भाग चार------------
एक शाम सुधीर ऑफिस से लौट रहा था कि गाड़ी से उतरा ही था कि बगल वाले घर के गेट से फुटबाल बाहर गिरी थी।सुधीर ने बॉल उठाई और डोर बेल बजायी..वो ही आदमी शायद उन बच्चो का पिता था बाहर आया।सुधीर बोला-"ये फुटबाल बाहर गिरी थी..शायद आपके बच्चों की है..मैं अकसर अपनी खिड़की से आप लोगों को खेलते देखता हूँ..आपका नया पड़ौसी हूँ"..
"जी शुक्रिया ..शायद बच्चों ने बाहर डाल दी होगी..अच्छा ! आप हमारे पड़ोसी हैं .."
सुधीर ने उन्हें अपना परिचय दिया..तो वो बहुत खुश हुआ और बोला-"सर प्लीज आइए  ना एक कप चाय हो जाय आप आएंगे तो हमें अच्छा लगेगा"..
सुधीर मना नहीं कर सका..और शायद करना भी नहीं चाहता था..उसे बस ये पारिज़ात नाम की गुत्थी सुलझानी थी।सुधीर ने ड्राइवर को फोन किया और बच्चों के लिये चॉकलेट्स मंगवाई।
"अरे सर आप नाहक ही परेशान हो रहे हैं..प्लीज आइए न"
सुधीर को देखकर बच्चे बाहर आ गए..
"बेटा अंकल को थैंक्यू बोलिये ..आपकी बॉल लाये थे..जिसे आप लोग ढूंढ रहे थे"..
"थैंक्यू अंकल"
सुधीर ने उन्हें चॉकलेट्स दी..बच्चे खुश हो गए थे..
तभी अंदर से एक महिला पानी लेकर आयीं
"माँ ये सुधीर सर हैं..हमारे नए पड़ौसी हैं"
"नमस्ते आँटीजी"
"आइए सर अंदर आइए"..
बहुत सुंदर तरीके से घर को सजाया गया था।
अचानक सुधीर की नजरें सामने दीवार पर लगी पारिज़ात कि फोटो पर अटक गयी.. फोटो पर माला लगी थी मतलब पारिज़ात अब नहीं...ऊफ़्फ़
सुधीर ने खुद को संयमित करके कहा."ये तो पारिज़ात हैं,जज साहब की बेटी..मैं इन्हें जानता हूँ.. क्या हुआ था इन्हें"..
"क्या!!  आप मेरी परी को जानते थे..अरे आपने अपना नाम सुधीर बताया था..आपने अपना पद भी तो बताया था...आप  ही तो परी के सुधीर बाबू हैं..परी के मन में बस इसी बात का मलाल था सुधीर जी..कि उसने आपको धोखा दिया था.."वो बोला।
"आज इतने सालों बाद खुद ही मेरे पैर आपके घर को चले आये..शायद पारिज़ात मुझे खुद इस घर में बुलाना चाहती थी..सब लोगो ने मुझ से कहा कि वो बदचलन थी..पर मेरा मन इस बात को मानने को तैयार नहीं था..पर मैंने उससे कई बार पूछा था कि कोई और ति नहीं उसकी जिंदगी में..पर हमेशा उसने मना ही किया"..सुधीर बोला।
"दरसल सुधीर बाबू..उसे उसके परिवार द्वारा उसे ब्लैक मेल किया जा रहा था..जज साहब को हमारे बारे में सब पता था..आपको शायद ये जान कर आश्चर्य होगा कि परी शादीशुदा थी..हम  शादी कर चुके थे..और जज साहब ये रिश्ता अपनाने को तैयार नहीं थे..वो परी को रोज़ धमकाते थे कि तुम्हारी शादी मान्य नहीं है. यदि तुमने सुधीर को कुछ भी बताया तो मैं सुरेश को उठवा लुंगा..वो बार-बार आपसे इसिलिये समय माँगती थी..वो इतनी अच्छी लड़की थी कि कभी किसी को धोखा नहीं दे सकती थी..वो जाने के बाद भी आपसे कॉन्टैक्ट करना चाहती थी पर उसके पास तो फोन ही नहीं था.. जज साहब ने उससे फोन छीन लिया था..आपको याद होगा कि आपही उसको फोन करते थे...वो आपको नहीं ..क्योंकि उसके पास तो फोन था ही नहीं ..और जब आप उसके साथ होते थे तो जज साहब उसे अपना वास्ता देकर भेजते कि सुधीर को कुछ न बताना ।सर वो घर से भागी नहीं थी..मैं कानूनी हक से उसे ले गया था..जज साहब ने बहुत चालें चली थी..मेरा पक्ष मजबूत था..उस बेचारी को तो ये भी नहीं मालूम था कि मैं उसे अब कभी लिवा भी ले जाऊँगा...पर हाँ ये बात सत्य है हमारे जाने के बाद कि जज साहब नहीं रहे थे.पर वो गलत नहीं थी..सुधीर बाबू"..
माहौल थोड़ा गमगीन हो गया था..सुधीर भी खुद को सम्हाल नहीं पा रहा था और न ही सुरेश भी
कुछ देर संयत होने के बाद सुरेश बोला-"सर सब कुछ सही था पर परी के दिलोदिमाग में ये बात घर कर गयी थी कि उसने आपको धोखा दिया है..वो रोज आपको पत्र लिखती पर पोस्ट नहीं करती..और हर रोज मुझसे कहती.."सुरेश शायद भगवान मुझे कभी  माफ नहीं करेगा मन मे सुधीर बाबू से माफी माँगने की हमेशा टीस ही रहेगी ।इस दौरान हमारे प्यारे की निशानियां भी हमारे पास आ चुकी थी..पर अभी छः माह पूर्व ही कार एक्सीडेंट में वो नहीं रही..मुझे भी काफी चोट आयीं पर..."
सुधीर शांत भाव से सब सुन रहा था।सुरेश अंदर जाकर पारिज़ात के लिखे पत्र लाए आया..
सुधीर उन पत्रों को पढ़े जा रहा था..उसकी आँखों से अश्रु धारा बह रही थी..एक लंबी सांस छोड़कर उसने खुद को संभाला और बोला"पारिज़ात मुझे विश्वाश था कि तुम बदचलन नहीं थी..शायद तुम आसपास ही हो.मुझे असलियत बताने के लिये ही...मेरे इस शहर में आते ही तुमने ...मुझे अपने घर की ओर खींच ही लिया"..
सुधीर घर से बाहर निकल रहा कि घर के लॉन में स्थित पारिज़ात के पेड़ से फूल गिरकर उसके हांथो में था...नारंगी..पीली आभा लिये...मानो पारिज़ात उसे अपने होने का अहसास बता रही हो...पारिज़ात मैंने तुम्हें माफ़ किया..तुम उस जहां में भी महकते रहो.. खुश रहो।
.....समाप्त....
स्नेह (सर्वाधिकार सुरक्षित)

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