पारिजात एक प्रेम कथा भाग-2

पारिजात एक प्रेम कथा भाग-2

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"मेरी दादी कहती थीं कि ये पारिजात के फूल शिवजी को बहुत प्रिय होते हैं..इन्हें पेड़ से तोड़ा नहीं जाता..रात से इसके नीचे चादर बिछा दी जाती है..और सुबह खुदबखुद चादर पर बिछ जाते हैं...

इसकी भीनी सुगंध वाह क्या कहने..और दादी ये भी कहती थीं कि यदि एक लाख पारिजात शिवजी को चढ़ा दिए जाएं तो मनोकामना पूर्ण होती है"--पारिजात अपनी ही रौ में बोले जा रही थी.. और सुधीर उसे एकटक निहारे जा रहा था।दोनों की नजरें मिलते ही ..सुधीर ने नज़रें हटा ली और बोला.."अरे बाप रे इस ज़माने की होकर ..आप इन बातों में विश्चास करती हैं..यक़ीन नहीं होता..आप तो खुद पारिजात है ..जिसे मिलेंगी उसकी मनोकामना पूर्ण हो जाएगी.."।
"जी आपने कुछ कहा"-पारिजात बोली
"न ना..नहीं कुछ भी तो नहीं कहा मैंने"।
"अच्छा आपसे एक पर्सनल सा प्रश्न पूछ सकता हूँ..यदि आप इजाज़त दें तो"..
"जी पूछिये"..
"आप इतनी खूबसूरत है..मॉर्डन है..तो फिर अरेंज मैरिज क्यों??"
वो पलट के बोली-"ये ही बात यदि मैं आपसे पूछूं तो"..
"मेरा तो साधारण सा उत्तर है..पढ़ाई और कैरियर ही मेरा प्यार थे..इसलिये पहले ही सोच लिया था..जो आएगी..वो पहली और लास्ट होगी"।
"अब आप बताएं?"सुधीर बोला।
"पापा बहुत सख्त हैं तो कभी इस ओर ध्यान गया ही नहीं"..एक आह भरते हुए वो बोली।
"नहीं यदि आपके दिल मे कोई और है तो आप मुझे बता सकती हैं"
"नहीं ऐसा भी कुछ नहीं "-शांत भाव से पारिजात बोली।
"तो आप इस रिश्ते से खुश होंगी "
"जी अभी तो मैं आपको जानती ही कितना हूँ.. मुझे कुछ वक़्त चाहिये होगा..क्या आप मुझे वक़्त दे पाएंगे."
अनायास पूछे इस प्रश्न की उसे आशा नहीं थी..वो सोच रहा था कि चट मंगनी पट ब्याह होगा पर शायद वो ठीक कह रही थी..एक दूसरे को समझना बेहद जरूरी भी था।
खैर पारिजात की बात रखते हुए उसने जज साहब से कुछ समय माँग लिया लेकिन ये इशारा भी कर दिया कि उसे रिश्ता उसे पसन्द है।
"बेटा क्या तुझे पारिजात पसन्द है"-शांता जी गए लौटते समय बोली।
"कार चलाते हुए सुधीर बोला-"माँ उसे कुछ समय चाहिये..और शायद ठीक भी है..दो एक मुलाकातों से हम एक दूसरे को समझ पाएंगे"..
कुछ दिनों बाद ..
"सर प्रणाम..मै सुधीर..क्या आज शाम मैं आपकी बेटी को अपने साथ कॉफी के लिये ले जा सकता हूँ"..
"बिल्कुल सुधीर जी...मैं तो चाहता हूँ जितनी जल्दी हो ये रिश्ता पक्का हो जाये और आप पारिजात आपकी हो जाये"...
जज साहब की बात सुन सुधीर शर्मा गया।
शाम को...
"पारिजात क्या आप ड्राइविंग कर लेती हो..."-ड्राइविंग सीट के बगल में बैठी पारिजात से सुधीर ने पूछा..
"हाँ कर लेती हूँ.. पर मुझे खिड़की से बाहर के दृश्य निहारना अच्छा लगता है जो ड्राइविंग करते सम्भव नहीं..ये सड़क किनारे अमलतास का पेड़ मुझे बहुत पसंद है..वैसे ये मेरी ही बिरादरी के हैं..क्योंकि मैं पारिजात जो हुई"-खिलखिलाकर पारिजात बोली..
उस उन्मुक्त हंसी में पारिजात बेहद खूबसूरत लग रही थी..सफेद टीशर्ट पर पीले और हलके नारंगी रंग के छींटे उस पर बेहद खिल रहे थे और उसके नाम को साकार कर रही थे..
"क्या आपको अपने नाम के अनुरूप ही रँग पसन्द है..वैसे बेहद खूबसूरत लग रही हो"।
"शुक्रिया ..हाँ वो तो मैं हूँ ही..सभी कहते है..ये रँग मुझ पे खिल उठते हैं"-एक गर्व मिश्रित मुसकुराहट के साथ वो बोली।
"क्या कभी किसी ख़ास ने भी ऐसा कुछ कहा है".
उसका चेहरा अचानक से उतर गया..संयमित होकर वो बोली.".आई वास् डिवा ऑफ माय कॉलेज"...
"सुधीर जी कॉलेज के प्रोफेसर तक मुझ से कहते कि तुम बहुत खूबसूरत हो"..आँखो में चमक के साथ वो बोली।
"चलिये रेस्त्रां आ गया .."कार रोकर सुधीर बोला।
तभी रेस्त्रां का मालिक जो सुधीर को पहचानता था वो बाहर आया।
"वेलकम सुधीर सर..वी वर वेटिंग फ़ॉर यु..गुड एविनिंग मैंम..सर यू बोथ कंप्लीमेंटिंग ईच अदर"..
"थैंक यू मिस्टर वर्मा"
"आप यहॉं आते रहते हैं"..
"अक्सर हमारी विभागीय मीटिंग इसी रेस्त्रां के हॉल में होती रहती हैं..यहाँ की कोल्ड कॉफी मुझे बहुत पसन्द है"-सुधीर बोला।
रेस्त्रां में उन्हें स्पेशल कॉर्नर हट(झोपड़ी नुमा केबिन)दिया गया।
केबिन की खिड़की के बाहर लॉन में बेहद खूबसूरत फव्वारा लगा था।
"अरे वाह हमारे शहर में इस तरह के रेस्त्रां भी हैं.ये मुझे बहुत अच्छा लग रहा है"-पारिजात बोली
"क्यों ?क्या आप अपने शहर के इस मशहूर रेस्त्रां के बारे में नहीं जानती"..
"जी..क्योंकि मैंने तो यहाँ से पढ़ाई करी नहीं..सिर्फ छुट्टियों में ही आना होता था...मुझे खुद को डेल्ही गर्ल कहलाना पसन्द है..इस शहर में मुझे केवल अपना घर पसन्द है..वो भी पारिजात की वजह से"..
"तो क्या सोचा तुमने शादी के बारे में.
"अरे अभी किसे करनी है शादी...न ना मेरा मतलब वो नहीं था ..अचानक से मुँह से निकले शब्दो को वापस लेती हुई वो बोली..नहीं मुझे आप अच्छे लग रहे हैं..एक दो मीटिंग और फिर फाइनल डिसीजन "..पारिजात बोली
"पारिजात जी आज तो मुझे फुर्सत मिल गयी..मेरा पद और कद ऐसा कि मुझे इतना समय नहीं मिलता है..जिम्मेदारियां बहुत है मेरे पास..चौबीस साल की उम्र में इतना पद बहुत मायने रखता है मेरे लिये..और फिर मैंने अपने जीवन का कीमती समय झोंका है ये सब पाने के लिये..आप मुझे बताए अपनी मंशा ..अगली मुलाक़ात हमारी कब हो ये मैं नहीं बता सकता..अगर आप फोन नम्बर शेयर करेंगी तो हम बातें जरूर कर सकते हैं"..
क्रमशः
स्नेह
(सर्वाधिकार सुरक्षित)..

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