पाताल भुवनेश्वर की यात्रा

पाताल भुवनेश्वर की यात्रा

   1997 में मैं और मेरी  बड़ी बहन दोनों ही जॉब में आ चुके थे।इत्तेफाक़ से हमारी पोस्टिंग एक ही साइड थी ।अल्मोड़ा हमारा घर था  वहां से मेरी पोस्टिंग लगभग 65-70किमी दूर और बहन की पोस्टिंग  लगभग 115 किमी दूर थी ।इसलिए छुट्टी पर ही हम घर आते। अक्सर मैं शनिवार की शाम बहन के पास  बेरीनाग (जिला- पिथौरागढ़)चली जाती और संडे को हम आस-पास के पहाड़ी इलाके में घूमने जाते । यहां  से 25 किमी दूर गंगोलीहाट नामक  स्थान है  जहां से 8-9किमी दूर एक प्राकृतिक गुफा है जिसे पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है।इसका उल्लेख पुराणों में  मिलता है ।वैसे कब-कैसे इस गुफा को खोजा गया इसके बारे में अनेक किवदंतियां है ।पर कलयुग में आदि गुरू शंकाराचार्य द्वारा इसकी खोज को आधार माना जाता है।
      यह प्राकृतिक गुफा अनेक गुफाओं का संयोग है। उत्सुकता और रोमांच पैदा करने वाली यह गुफा वर्तमान में भारतीय पुरातत्व विभाग के अधीन है जिसे देखने के लिए न केवल भारत अपितु विश्वभर से सैलानी यहां आते हैं। गाइड की सहायता से  इसके भीतर जाया जाता है।बाहर से देखने पर कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता की इसके नीचे  लगभग 1•6 किमी लंबी एक गुफा है।ऊपर चारों ओर देवदार का घना जंगल है।यह पृथ्वी से  लगभग 90  फीट नीचे है ।इसकी दीवारें चूने -पत्थर की हैं जिनसे पानी रिसता रहता है।इसमें उतरने का कोई मार्ग निर्मित नहीं है। बेहद चिकने और बड़े -बड़े पत्थरों पर पैर टिकाकर ही नीचे उतरा जाता है ।इसके लिए जंजीरें बाँधी गई हैं।जिनका सहारा लेकर गुफा के तल तक पहुँचते हैं। यहां ऑक्सीज़न की कमी हो जाती है इसलिए बच्चों और बूढ़ों को प्रवेश की अनुमति नहीं मिलती ।अब आपको इस रहस्यमय गुफा की कुछ खास बाते बताती हूं । यहाँ पत्थरों में बनी प्राकृतिक आकृतियां हैं जो विविध पौराणिक कथाओं से मिलती हैं।इसका सम्बंध केदारनाथ,बदरीनाथऔर अमरनाथ से बताया जाता है।इसका उल्लेख पुराणों से माना जाता है।तल पर पहुचँते ही  एक पत्थर है उस पर अंकित चिन्हों के आधार पर कहते हैं कि यह आदि-त्रेता-द्वापर-और कलयुग को दर्शाता है ।आगे बढ़नेपर शेषनाग के फन जैसी आकृतियां दिखाई पड़ती हैं  कहते हैं कि इस पर ही पृथ्वी टिकी है।आगे एरावत हाथी के एक हज़ार पैरों की सीे बनावट है । जैसे -जैसे गुफा में आगे बढ़ते हैं रोमांच और कौतुहल भी बढ़ता जाता है। इस गुफा में ऊपर  से गाय के थन जैसी आकृति है पहले इससे दूध टपकता था कहते हैं कि किसी ऋषि ने इसकी खीर बना कर खा ली थी इसलिए कलयुग में वह पानी बनकर टपकने लगा । यहां काल भैरव की जीभ की तरह आकृति है यदि इसके मुँह से पेटऔर पूछं तक पहुचा जाए तो मोक्ष मिल जाता है पर आज तक कोई वापिस नही आ सका ।(संभवतःऑक्सीजन की कमी से दम घुँ ट जाता होगा) एक आकृति प्रथमेश(गणेश) के वास्तविक सिर की जैसी है बताते हैं कि जिस समय शिव ने क्रोध में आकर गणेश का सिर धड़ से अलग किया था उसे यहीं स्थापित किया।यहां एक कुण्ड भी है जिसके चारों ओर 33 करोड़ देवी देवताओं के सिर जैसी आकृति है ।कोई कहता है कि ये इनमें स्नान करते हैं तो कहीं ये बात भी बताई जाती है कि यह शिव के नागों के पानी पीने के लिए था इसकी रक्षा के लिए एक हंस रखा गया था पर उसने स्वयं ही इसका पानी पी लिया तब शिव ने गुस्से में उसके थप्पड़ मारा था जिससे उसकी गर्दन पलट गई ।ये हंस ठीक कुँड के आस -पास नज़र आता है। यहाँ पर सबसे प्रमुख चीज़ है आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित किया गया शिवलिंग। गुफा की छत से गिरने वाली हर तीसरी बूँद इस पर गिरती है।इस गुफा के अंतिम छोर पर एक रहस्यमय मार्ग जाता है कहते हैं कि यहां पर पाण्डवों ने चौपड़ खेला था और यहीं से वह अग्यातवास के लिए गए थे ।ऐसी ही अनेकों पौराणिक कथाओं को इस प्रकृतिक गुफा की आकृतियां बताती हैं।जिनको देखने पर रोमांच उत्साह और कौतुहल  बना रहता है ।
     वर्तमान में इन आकृतियों के आकार में कतिपय परिवर्तन संभव है जिसका कारण साइंटिफिक  हो सकता है। पाताल भुवनेश्वर नामक इस गुफा की यात्रा मेरे लिए एक यादगार यात्रा बन गई ।23 वर्ष पहले की गई यात्रा और इस गुफा  के बारे में वर्णन करते हुए वह सभी आकृतियां मेरी आंखों में पुनः जीवंत हो उठी मानों कल की ही बात हो। 
      दोस्तों यदि आप पर्यटन के शौकीन हैं और उत्तराखंड आएं तो इस प्राकृतिक और रहस्यमय गुफा के दर्शन करने का प्लान करें ।बस ध्यान रहे प्रवेश के लिए आपको स्वस्थ होना चाहिए ।किसी प्रकार के एस्थमा या हृदय रोगी यहां नहीं जा सकते । आपको मेरा यात्रावृत्त कैसा  लगा  कंमेंट कीजिएगा ।
      आपकी दोस्त
      डॉ यास्मीन अली।
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