पत्रकार बनाम जनता ?

पत्रकार बनाम जनता ?

पत्रकार बनाम जनता ?

"सदियों की ठण्डी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है ।" 

राष्ट्रकवि श्री रामधारी दिनकर की कविता की ये पंक्तियाँ , मौजूदा समय की परिपाटी को सटीक और अचूक तरीके से व्यक्त करती हैं | इन पंक्तियों के माध्यम से राष्ट्रकवि श्री रामधारी दिनकर जनता की ताकत का छोटा सा परिचय देते हैं और कहते हैं कि सिंहासन खाली करो कि जनता आती है । क्यों है जनता जनार्दन , क्यों है जनता लोकतंत्र का सबसे बड़ा कर्ता | सरकारों के द्वारा पत्रकारों के खिलाफ कार्यवाही करना हमने कई बार देखा हैं लेकिन नागरिको का पत्रकारों की खिलाफ कदम उठाना , अमूमन नहीं होता| आखिर नागरिको का क्यों संयम टूटा और किस वजह से टूटा ?

 देश की विभिन्न छेत्रों में  चुनिंदा पत्रकारों के खिलाफ दाखिल FIR, नागरिको के संयम का टूट जाना दिखाती हैं | ये सारे पत्रकार , बड़े बड़े न्यूज़ चैनल्स के साथ काम करते हैं  और प्राइम टाइम के बहुत बड़े हिस्से पर अकेले काबिज़ हैं | इन सभी FIR में इन पत्रकारों की खिलाफ अलग अलग धाराओं के अधीन आरोप लाये गए हैं | इनमे से कई अपराध गैर जमानती अपराधों की श्रेणी मैं भी आते हैं | ये सभी पत्रकार, टीवी मीडिया के राइट विंग के पत्रकार माने जाते हैं | पत्रकारों की ये टुकड़ी बिना बात के चीखते औरचिल्लाती हैं, और बहस के बाद अपना फैसला सुनाती हैं | कई बार ये पत्रकार अपने शो में बुलाये हुए मेहमानो की बेइज्जती भी करते दिखाई दिए | लेकिन कभी भी किसी ने इन्हे नहीं टोका , न आग उगलने के लिए , न चीखने और चिल्लाने के लिए और न ही प्रमाणित-अप्रमाणित खबरों के लिए | 

लेकिन अब अलग अलग जगह पर , नागरिको ने जिम्मेवारी ली इस टीवी द्वारा प्रायोजित बदहवासी को रोकने के लिए | आजादी हमेश जिम्मेदारिओं के साथ आती हैं | यदि आप अपनी जिम्मेदारी से बेईमानी करेंगे तो आपकी आजादी पर भी हक़दारी नहीं रही | मौजूदा समय में पत्रकारिता अपने निम्नतम स्तर पर जा चुकी और कुछेक पत्रकारों को छोड़कर देश का कोई भी पत्रकार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की पत्रकारिता करता नहीं देखता हैं , निडर और निश्छल | जहाँ देश के एक पत्रकार को मैगासे पुरस्कार जैसे बड़े पुरस्कार से सम्मानित किया गया वही ये पत्रकार , दिन रात देश के भाईचारे को तोड़ रहे हैं| लेकिन बस, अब बहुत हो गया ,शायद कानून के सामने फरियाद लगते ये नागरिक यही सन्देश देना चाहते हैं | 

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