पढ़ेगा ग्रामीण इंडिया तभी बढ़ेगा युवा इंडिया

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होमस्कूलिंग :- चित्र के साथ पाठ ग्रामीण छात्रों ने सीखना शुरू कर दिया

 शिक्षा हमारे जीवन का अहम हिस्सा है। परन्तु इस कोरोना काल में ऐसी विकट परिस्थितियां उत्पन्न हो गई कि जीवन उपयोगी सुविधाओं की लिस्ट में शिक्षा पिछड़ कर रह गई। स्वाभाविक है स्कूलों का बंद करना जरूरी था ताकि संक्रमण बच्चों से दूर रहे। शिक्षा के वैकल्पिक साधन सामने आए जैसे की ऑनलाइन शिक्षा परंतु यह केवल एक विशेष वर्ग तक सीमित है।

एक बड़ा तबका आज भी बिजली, इन्टरनेट और स्मार्ट फोन जैसी लक्जरी से कोसों दूर है और उनके लिए ऑनलाइन शिक्षा एक स्वप्न की तरह ही है। हाँ कोरोना के कारण ऑनलाइन शिक्षा ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब छात्रों के लिए एक बड़ा संकट है। एक ओर, स्कूल बंद हैं, दूसरी ओर सीखने के लिए 'स्मार्टफोन' या 'लैपटॉप' नहीं हैं। इसी बीच एक महाराष्ट्र के सोलापुर से एक ऐसी सुखद घटना सामने आई है जो उम्मीद की नई किरण की तरह है। वहाँ इस समस्या पर काबू पाने के लिए, एक श्रमिक क्वार्टर के शिक्षकों ने क्षेत्र की दीवारों को उपयोगी बनाया और इन गरीब बच्चों की स्थिर शिक्षा फिर से शुरू की गई।

 सोलापुर शहर का नीलामनगर इलाका अपने गरीब मजदूरों और घरेलू कामगारों के लिए जाना जाता है। भारत मराठी मंडल की आशा मराठी विद्यालय और धर्मना सादुल प्रषाला इन कॉलोनियों में काम कर रही हैं।  इन दोनों स्कूलों में ज्यादातर असंगठित मजदूरों के बच्चे पढ़ते हैं। लेकिन कोरोना के कारण, स्कूल बंद हो गए और इन गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा बंद हो गई। क्योंकि यहां के अधिकांश छात्र और अभिभावक ऑनलाइन शिक्षा के लिए स्मार्टफोन नहीं रखते हैं। इसलिए, आधे शैक्षणिक वर्ष के बाद भी, इन छात्रों को कैसे पढ़ाया जाए, यह सवाल यहाँ के स्कूल-शिक्षकों के सामने था।

 बहुत सोचने के बाद, यहाँ से एक शिक्षक राम गायकवाड स्कूल परिसर की जगह घरों की दीवारों पर पाठ पढ़ाने का विचार लेकर आए।  सभी को यह विचार पसंद आया, लेकिन सवाल दीवार की उपलब्धता, पेंटिंग की लागत, शिल्पकार के रूप में उठा। लेकिन तब भारत शिक्षण संस्थान के अध्यक्ष हारून पठान ने इसका समर्थन किया। अन्य शिक्षकों के साथ, शैक्षिक संस्थान ने भी योगदान दिया। यही नहीं, पूर्व छात्रों के साथ-साथ ग्रामीणों ने भी मदद के लिए हाथ बढ़ाया।

तो यह सब कैसे हुआ?

 क्षेत्र में कुल तीन सौ दीवारों का चयन किया गया था। पहले इन दीवारों में से 180 पर पाठ लिखा गया था। मराठी कहावत, मराठी और अंग्रेजी व्याकरण, ज्यामिति और गणित के सूत्र, प्रमेय, रीडिंग, विज्ञान अनुसंधान, समाजशास्त्र पाठ आदि जैसी शैक्षिक जानकारी तैयार की गई। अब इस क्षेत्र में रहने वाले बच्चे समय-समय पर इस पाठ को सीखते हैं।  कोरोना से देखभाल के बीच बच्चों की शिक्षा फिर से शुरू हुई है।

 यह अवधारणा पेश की गई थी ताकि आर्थिक रूप से वंचित परिवारों के बच्चे तालाबंदी की सूरत में भी शैक्षिक धारा में रह सकें। चूंकि अध्ययन घरों की दीवारों पर किया जा रहा था, इसलिए बच्चों ने हंसते हुए सीखना शुरू कर दिया। इस घटना से यह विचार कौंधता है कि क्या देश के अन्य ग्रामीण इलाक़ों में भी इस तरह के अध्ययन पैटर्न को उपयोग में नहीं लाया जा सकता है? जरूरत सिर्फ आगे बढ़ने की है, साथ आने की है ताकि देश एक बड़ा हिस्सा इस संवैधानिक अधिकार से वंचित ना रह जाए।

(चित्र लोकसत्ता के सौजन्य से) 

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