पहचान तो संस्कारो से होती है

पहचान तो संस्कारो से होती है

आज फैशन के दौर में जहाँ आरती बहुत ही सरल एवम साधारण तरीके से रहती ,जहाँ दुनिया की औरतें कहा से कहा पहुँच गयी ,वही उसे न तो  सजने सवरने का सलीका था और नही कपड़ो के ओढ़ने पहनने का।जमाने के चलन के हिसाब से उसके तोर तरीक़े बहुत पुराने ख़यालात वाले थे।परंतु वह जैसे थी उसी में खुश रहती।वही उसके पति सूरज थोड़े अलग प्रवर्ति के थे।

सूरज शहर का पढ़ा लिखा नोजवान था वही आरती गांव की सरपंच की एक लड़की थी जो बेहद सरल और साधारण पारिवार से थे।लेकिन उसकी परवरिश बहुत ही सांस्कारिक माहौल में हुई उसके परिवार में सभी लोग मिलजुलकर रहते।पूरे गांव में उनकी प्रेम और एकता की मिसाल थी।

आरती की बड़े ताऊ जी का बेटा शहर में एक बड़ी कंपनी में मैनेजर पद पर कार्यरत था और सूरज उसका सहकर्मी।वही से सूरज ओर आरती की शादी की बात शुरू हुई और आरती शादी करके शहर में आ गयी।

यू तो आरती भी हिंदी साहित्य में बी.ए पास थी और स्वभाव से बेहद संजीदा थी।बोली में ओर व्यवहार में इतनी मिठास की सब उसकी तरफ खिंचे चले आते।कुछ ही दिनों में उसने ससुराल के प्रत्येक सदस्य के दिल मे अपनी छाप  छोड़ दी।सब उससे बहुत प्यार करने लगे ।न कोई दिखावा,न ही छलावा ऐसा था उसका व्यक्तित्व।एकदम स्पष्ट वादी ।

उधर सूरज दिखावे में ज्यादा जिता था वो चाहता था कि उसकी बीवी भी आजकल की लड़कियों की तरह शार्ट पहने,ऊँची हील डाले।परंतु आरती इन सबसे विपरीत पहनावे की थी।वह साड़ी, ओर सूट सलवार में अपने आप को ज्यादा कम्फ़र्टेबल महसूस करती।ऐसा नही की उसे आजकल के ट्रेंडिंग कपड़ो से परहेज था परंतु कहते है ना वही पहनो जो आपको अच्छा लगे।तो आरती बस वही पहनती जो उसे अच्छा लगता।

आज शाम को सूरज की आफिस में फैमिली पार्टी थी जिसमे सभी अपनी अपनी फैमिली को लाने वाले थे।सूरज चाहता था कि आरती कुछ ऐसा पहना जिससे उसे ऑकवर्ड फील न हो।शाम होते ही सूरज ने आरती को जल्दी से तैयार होने के लिए कहा और खुद भी फटाफट तयार होने चला गया,सूरज बहुत उत्साहित था क्योंकि आज वो शादी के बाद,पहली बार किसी पार्ट में आरती को साथ लेकर जाने वाला था।सबसे मुलाकात करवानी थी सभी दोस्तों की जिद्द थी कि आरती जरूर आये।तो वो चाहता था कि वो दोनों आज इस पार्टी का मुख्य केंद्रबिंदु बने।लेकिन दूसरी तरफ उसकी दिमाग मे कुछ उथलपुथल सी मची थी।कि आरती वही पुराने तरीके से तयारी होकर आयगी जो उससे बिल्कुल पसंद नही था।

सूरज आरती को चलने के लिए आवाज लगाता है कि जल्दी से नीचे आये।जैसे ही आरती नीचे उतरती हुई आती है तो सूरज देखता है की आरती लाल रंग की कॉटन सिल्क साड़ी,माथे में सिंदूर,पैरो में पायल,हाथो में चूड़ा, माथे पर बिंदिया मानी ऐसी लग रही जैसे स्वर्ग से कोई अप्सरा उतरी हो।परंतु सूरज को तो जैसे आरती की वेषभूषा वही पुरानी रीति रिवाज वाली लगती है।मन मे अनेको तरह के सवाल जवाब लिए सूरज आरती को पार्टी में ले तो आता है,परन्तु वो मन ही मन एक अजीब सी शर्मिंदगी सी महसूस करता है कि सब सोचेंगे कि देखो इतने बड़े पद पर नियुक्त आदमी की बीवी एकदम पिछड़ी।

जैसे ही पार्टी में सब शामिल होते है तो सूरज सभी की बीवियों को देखता की सब एक दम चुस्त ओर शार्ट कपड़ो में है सिर्फ एक उसी की बीवी साड़ी में लिपटी सी आयी है।सभी सूरज की बीवी से मिलने के लिए आतुर होते है सूरज उसकी सभी से मुलाकात करता है,आरती भी सभी के साथ घुलमिल जाती है उसके व्यहार को देखके सभी उसकी बहुत तारीफ करते है।उसकी सुंदरता और कोमलता से भरे आचरण को देख सब मंत्रमुग्ध हो जाते है और सब उसकी तारीफ के पुल बांधने लगते है । बधाई हो सूरज सर्! मैडम बहुत संस्कारी ओर बेहद समझदार है आप बहुत लकी है सर्, की आपको ऐसी जीवनसंगनी मिली,जो न केवल सौन्दर्य से परिपूर्ण अपितु आचरण एवम स्वभाव से भी बेहद अच्छी इंसान है।

फिर सभी ने आरती को कुछ गाने या अपने शब्दो मे प्रस्तुति देने को कहा,आरती एक बार तो सूरज की तरफ देखती है मानो सूरज कहना चाहते हो-कि नही नही,तुमसे न हो पायेगा,तुम रहने ही दो।

लेकिन आरती को तो सिर्फ अपने दिल की माननी थी,उसने हाथो में माइक लिया और अपनी सुरीली मधुर आवाज में उसने जो प्रस्तुति दी,सभी देखते रह गए।

उसकी मधुर आवाज का सूरज भी दीवाना हो चुका था उसे ये कतई अंदाज नही था कि आरती सुंदर होने के साथ साथ इतनी सुरीला भी गाती है,उसकी आरती के प्रती नजरिया ही मानो बदल गया,जब पार्टी में मौजूद सभी लोगो ने उसकी बीवी की तारीफों के पुल बांधने शुरू किए।अब सूरज समझ गया कि सिर्फ पोशाक ही इंसान की पहचान नही बनती।बल्कि पहचान उसके व्यवहार और आचरण से बनती है अब सूरज बहुत ही सर्मिन्दा महसूस कर रहा था अपनी पिछड़ी सोच पर।ओर मन मे एक खुशी भी थी उसने आरती को पहली बार शायद उसी के नजरिये से देखा और उसे समझा।और यही आरती के संस्कारो की जीत थी।

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