रज्जो अम्मा

उन पाँच हजार को अपने हथेलियों में ऐसे थामा राधा ने जैसे किसी नवजात को थामा हो, जैसे आज उसकी उम्मीदों का जन्म हुआ था| जैसे जन्म हुआ था सतरंगी सपनों का! ये उसके जीवन की पहली कमाई थी। उसकी आँखें आँसुओं से भीग गईं और

रज्जो अम्मा

"राधा! ये लो तुम्हारे पैसे।" कपड़े के थोक विक्रेता श्याम जी भाई ने पाँच हजार रुपये पकड़ाते हुए कहा|

उन पाँच हजार को अपने हथेलियों में ऐसे थामा राधा ने जैसे किसी नवजात को थामा हो, जैसे आज उसकी उम्मीदों का जन्म हुआ था| जैसे जन्म हुआ था सतरंगी सपनों का! ये उसके जीवन की पहली कमाई थी। उसकी आँखें आँसुओं से भीग गईं और मीठी सी मुस्कान उसके होठों पर तैर गई|

"खुश हो ले बेटा, अभी तो ये तेरे जीवन की पहली कमाई है| अभी तो कितनो आना बाकी है, तेरे हाथ में इतना हुनर जो है| जा बिटिया! घर जा।"

श्याम जी भाई की बातें सुनकर राधा खिलखिला पड़ी और तेज कदमों से अपने घर की तरफ़ बढ़ चली। उसके कदम तेज थे और सशक्त भी| पतली पतली गलियों से होकर तेज कदमों से आगे बढ़ रही, आत्मविश्वास इतना कि लग रहा था सब उसके लिए खुश हैं और उसे ही देख रहे हों| वो एक तरह से ख़ुद पर ही इतरा रही थी| नेत्र अभी भी सजल थे और इतने कि सामने का सबकुछ धुंधला दिखाई दे रहा था| उसी धुंध में ही वो अतीत के गलियारे में खो सी गई|

कैसे लगभग एक साल पहले वो रोज पीटती थी, कभी पति के हाथों, कभी सास के हाथों| छोटी छोटी बात को लेकर रोज मार पड़ती| पति को दूसरी पसंद आ गई थी और उसे शादी कर घर लाना चाहता था| सास को भी नई बहू के साथ दहेज का लालच था| मायके में माता पिता रहे नहीं जो जाकर उन्हे अपनी वयथा सुनाए| भाई भाभी थे लेकिन वो इतने गरीब कि बेचारे खुद ही एक समय के रोटी पर जिंदा थे।

इतना भी सहारा नहीं था कि कोई उसे पति और सास के खिलाफ थाने में भी ले जाए| माँ बाप ने गरीबी के चलते पढ़ाया नहीं, सो अपने अधिकार को भी नहीं जानती थी वो, भोली सी राधा उस मार पीट को अपना तकदीर मान बैठी थी| घर का सारा काम करने के बाद भूख लगने पर दो ढंग के निवाले नहीं मिलते| हद तो तब हो जाती जब छह महीने की भूख से बिलबिलाती बेटी अपने सीने से लगाती तो दूध का एक कतरा नहीं आता उसके मुँह| तब वो बेटी के साथ ख़ुद भी रोने लगती|

एक दिन ऐसे ही पिटाई कर सास ने बाल पकड़ कर दरवाजे पर ला फेंका, बोल पड़ी "चली जा यहां से और साथ में अपनी बेटी को भी ले जा| बाप ने जितना दिया नहीं उतना तो तू ठूस चुकी| मेरे बेटे का जीवन नरक कर दिया और ऊपर से बेटी पैदा कर हमारे सर का बोझ बढ़ा दिया|"

राधा बिलखती हुई दरवाजे पर जा गिरी, उस नवजात को सीने से चिपकाए| ठीक सामने राज्जो काकी गुजर रही थी, दौड़ के राधा को उठाया| राज्जो काकी जिनका कोई नहीं था, अकेली बुढ़िया बहुत साल से यहां रहती थी| कोई नहीं जानता था वो अकेली क्यों है| राज्जो काकी ने राधा को उठाया और सास बोल पड़ी "क्या रे शुगनी! अपने बहू के साथ कोई ऐसा व्यवहार करता है? बुलाऊँ पुलिस को?"

"काकी अब चाहे पुलिस बुलाओ या थाना, अब तो इसे मै घर में ना रखने वाली| तुम को इतना प्यार आ रहा है तो ले जाती ना अपने घर?" कहते हुए उसने जोर से दरवाजा बंद कर लिया|

राज्जो काकी ने राधा का हाथ पकड़ा और ले आई अपने घर| छोटा ही सही बहुत सुव्यवस्थित घर था| राज्जो काकी ने उसे बिठाया| हल्दी वाला गरम दूध दिया और बच्ची को अपने हाथ में लेकर खिलाने लगी| .

उनके आँखों में आँसू था जिसे राधा ने देख लिया राधा पूछ बैठी

"अम्मा आप रो रही हैं! क्यो"

"कुछ ना बिटिया!" | कहते हुए एक फोटो की तरफ देखने लगी|

राधा ने देखा तो वो तस्वीर राज्जो काकी के युवावस्था का था उसमें शायद उनकी और बाबा थे|

"राधा तू नहीं जानती मै कौन हूँ, कोई नहीं जानता! मै एक किन्नर हूँ| मै नही चाहती थी कि मै नाच गाकर सड़क पर घूम घूम के पैसे मांगू इसलिए वर्षों पहले मै मुंबई भाग आई| और यहाँ आकर ये सिलाई का काम सीख कर सिलाई करने लगी जितनी भी कमाई होती दो रोटी का बचा कर सारा अनाथालय को देती जाती हूँ| "

" आज तुझे बताया जानती हूँ अब तेरा गुजारा मेरे ही साथ लिखा है| इस बच्ची को गोद में लिया तो अंदर की माँ ने अपना रूप धर लिया| "

कहते हुए मातृत्व से भरा हाथ राधा के सर पर फिरा दिया|

बस क्या था अगले ही दिन से राधा को सिलाई सिखाना शुरू कर दिया राधा ने भी बहुत तेजी से फैशन वाले कपड़े सीना सीख लिया| कितने गोटेदार फ्राक, झबले, पैंट, शर्ट सब कुछ|

अब राज्जो अम्मा का सारा काम उसने संभाल लिया राज्जो अम्मा तो उसकी बेटी के प्यार और दुलार में ही निहाल हुए जा रही थी उनके अंदर की माँ का जैसे पुनर्जन्म हुआ था।

बस ये पैसे जो थे राधा के काम की पहली कमाई थी| . इस बार का सारा कपड़ा उसने खुद डिजाइन भी किया था और बनाया भी था।

राधा अपने घर की गली में पहुँची एक तेज कार के हार्न से उसकी तन्द्रा टूटी और वो अतीत के उस सख्त कटिले धरातल से लौट आई सपनों के इस दुनिया में जहाँ राज्जो अम्मा के मातृत्व की छाँव थी, अपने सशक्त होने का गर्व और आत्मविश्वास था, अपनी बेटी को अपने दाम पर पालने का मीठा एहसास भी|

दरवाजे पर पहुंची और उसपर लगे सांकल से दरवाजा खटखटाया| राज्जो अम्मा ने दरवाजा खोला तो उनके गले से लिपट गई| आँखो से आँसू की सैकड़ों धाराएं फूट पड़ी जैसे पिछले सारे गमो को अपने तेज धारा के आवेग में बहा ले जाना चाहती हों!

राज्जो अम्मा के हाथ पर पैसे रख कर उनके चरण छू लिए राज्जो अम्मा ने वो पैसे भगवान के चरणों में।

आज पहली बार खुद पैसे कमा कर राधा के चेहरे के भाव ही बदल गए| चेहरे पर ऐसी चमक जैसे कोई नावयौवना हो, आँखों में जाने कितने ख्वाब मचलने लगे| उसने राज्जो अम्मा की तरफ देखा तो वो अपने नव मातृत्व का आनंद लेने में मगन थी| राधा दौड़ कर गई और उन दोनों को गले से लगा लिया।

दोस्तों मेरी नई कहानी उम्मीद है कि आप सभी को पसंद आएगी|

आपकी 

अर्चना के. शंकर (अर्चना पाण्डेय) 

What's Your Reaction?

like
4
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
1