रामायण की कुछ झांकियां दादा जी के संग ( कहानी -4 )

रामायण की कुछ झांकियां दादा जी के संग ( कहानी -4 )

आज फिर राघव का बालमन टी.वी. पर कोई न्यूज़ देखकर विचलित हो गया और वह दादाजी के कमरे में आकर बैठ गया और पूछने लगा-

"दादाजी यह दलित लोग कौन होते हैं, क्या यह किसी छोटी जाति से संबंध रखते हैं? मैंने आज न्यूज़ में सुना कि दलित लोगों को लेकर  कुछ झगड़ा चल रहा था।"

दादाजी - "बेटा यह दलित, छोटी या बड़ी जाति ऐसा कुछ नहीं होता । यह सब समाज ने ही अपनी सुविधा अनुसार बनाए हुए हैं।" भगवान ने सब इंसानों को एक जैसा बनाया लेकिन इंसान ने फिर उसे धर्म जाति में बांट दिया।

बेटा, हमें कभी भी इस तरह का कोई भेदभाव ना मन में रखना चाहिए और ना ही अपने व्यवहार में दिखाना चाहिए।

तुमने रामायण में देखा होगा कि कैसे श्रीराम एक शबरी के झूठे बेरों को खा लेते हैं। यहां पर वह सिर्फ इतना ही संदेश देना चाहते हैं कि जब भावना प्यार की होती है तो वहां कोई भी छोटा बड़ा या अमीर गरीब कुछ भी नहीं होता।

तुमने यह भी देखा होगा कि राम जी की मित्रता निषाद के साथ थी। तो जब श्रीराम ने जिन्हें कि हम भगवान मानते हैं कभी कोई भेदभाव नहीं किया तो हम कैसे कर सकते हैं?

यह समाज कहता है कि बाल्मीकि जी भी छोटी जाति से संबंध रखते थे तो सीता माता क्यों इतने समय तक उनके पास रही । उनके पुत्र लव और कुश की सारी पढ़ाई लिखाई बाल्मीकि जी के निरीक्षण में ही हुई। और जब राम जी की बाल्मीकि जी से मुलाकात हुई तब उन्होंने भी उनके चरण छुए । 

तो तुम ही बताओ बेटा फिर जाति कहां थी? छोटा बड़ा कहां था?बेटा हमारा कोई ग्रंथ हमें ऐसी शिक्षा नहीं देता। इसलिए हमें भी ऐसी बातों से परहेज करना चाहिए, दूर रहना चाहिए और जितना हो सके समाज को भी इन चीजों से बचाने का प्रयास करना चाहिए।
उम्मीद है तुम मेरी बात समझ गए होंगे।

राघव - जी, दादा जी ....मैं आपकी बात भी समझ गया और मैं हमेशा ध्यान रखूंगा कि ऐसी किसी भी बात को महत्व ना दूं।

हमारा काम ही यानि हमारे कर्म ही हमारी पहचान है।

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Madhu Dhiman

Pink Columnist - Haryana

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