रंग भरी एकादशी व होलिका दहन उत्सव

रंग भरी एकादशी व होलिका दहन उत्सव

रंग भरी एकादशी व होलिकादहन उत्सव

फागुन के महीने में एकादशी का भी बहुत महत्व होता है। इसे रंग भरी एकादशी कहते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शंकर अपने विवाह के पश्चात पहली बार माता पार्वती को लेकर काशी गये थे। इसीलिए इस दिन से ही उनके स्वागत में होली खेलना प्रारंभ हो जाता है जो छः दिन तक जारी रहता है। काशी विश्वनाथ मंदिर में विशेष उत्सव मनाया जाता है और भगवान का विशेष श्रृंगार किया जाता है।
     

इस दिन आँवले के पेड़ की पूजा अर्चना करने की परम्परा है अतः इसे आमलकी एकादशी भी कहते हैं। आमलकी एकादशी पर भगवान विष्णु व माँ अन्नपूर्णा की पूजा भी की जाती है। मान्यता है कि विष्णु भगवान ने आँवले के वृक्ष को आदि वृक्ष के रूप में प्रस्थापित किया है। इसमें ईश्वर का वास माना गया है। लोग आँवले की पूजा करके प्रसाद रूप में ग्रहण करते हैं।
इसके बाद चार दिन बाद आती है पूर्णमासी जिस दिन होलिका दहन किया जाता है।

फागुन मास की पूर्णिमा का विशेष महत्व है। प्राचीन काल में राजा हिरण्यकश्यप हुआ है जिसका प्रहलाद नाम का एक पुत्र था जो भगवान विष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानता था अतः पुत्र की हत्या करवाना चाहता था। जब सारे हथकंडे विफल हो गये तो उसने अपनी होलिका नाम की बहन से जिसे यह वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे जला नहीं सकती सहायता ली। होलिका प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गयी।परन्तु प्रहलाद बच गए तथा होलिका का दहन हो गया।
तभी से यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है।
 अग्नि में अपनी सभी बुराईयों व शत्रुता को प्रतीकात्मक रूप से जलाकर लोग गले मिलते हैं।
अगले दिन अबीर गुलाल व रंगों से होली खेली जाती है। पकवान बनते हैं जिन्हें लोग मिलकर खाते खिलाते हैं व प्रसन्नता बाँटते हैं।

       

अर्चना सक्सेना

What's Your Reaction?

like
0
dislike
0
love
0
funny
0
angry
0
sad
0
wow
0