रस्मोंं वाला दिन

रस्मोंं वाला दिन

 ससुराल में पहला दिन- याद आते ही चेहरे पर मुस्कान आ गई। विदाई के बाद ससुराल तक आते-आते बहुत रात हो गई थी इसलिए एकाध ज़रूरी रस्मों को करवाकर सब सो गए थे। सुबह उठी तो मेरे छोटे देवर जी चाय लिए हाजिर थे कि भाई और भाभी के साथ ही चाय पीएंगे।

    उसके बाद मैं नहा कर तैयार हो गई फिर पैर छुआई की रस्म के बाद बारी आई कंगना-खिलाई की रस्म की। तीन राउंड हुए जिसमें दो मैं जीती और एक पतिदेव। मेरी चाची माँ ने इसमें थोड़ी चीटिंग करी, वह अँगूठी और कंगना मेरी तरफ ही डाल रहीं थीं और बोल रहीं थीं जल्दी से निकाल बेटा।

     यह सब करते दोपहर हो गई थी तभी यह आए और बोले मसूरी चलते हैं, तुम सलवार-कुर्ता पहन लो आराम रहेगा। मुझे बहुत हिचकिचाहट हो रही थी, मेहमानों से भरा हुआ घर और मैं बाहर घूमने जाऊँ। मैंने इनसे कहा ऐसे जाना ठीक नहीं होगा, मेरी बात सुनकर ये कमरे से बाहर चले गए। थोड़ी देर में मम्मी आयीं और कहने लगीं रिशेप्शन कल है, सब बच्चों का दिल कर रहा है जाने का तुम लोग चले जाओ।

     मसूरी की माल रोड की चहल-पहल और नीचे दिखता हुआ देहरादून बहुत ही खूबसूरत लग रहा था, हमारे साथ मेरे जेठ जी और दोनों देवर थे। सबसे साथ और अपनेपन से मेरा ससुराल में पहला दिन एक यादगार दिन बन गया।

~सुमेधा

स्वरचित, मौलिक

#ससुरालमेंपहलादिन

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