साड़ी का इतिहास

यहां कवि ने साड़ी के वर्णन को खूबसूरत तरीके से पिरोया है । साड़ी एक पहनावा ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति की पहचान है  साड़ी एक ऐसा परिधान है जो प्राचीन काल से स्त्रियों जिंदगी का अहम हिस्सा माना गया है । 5 से 6 फुट का कपड़े से बना ये परिधान बिना सिलाई के चोली और पेटिकोट के साथ पहना जाता है । साड़ी विश्व की सबसे लंबी और पुराने परिधानों में एक है। इसकी लंबाई सभी परिधानों से अधिक है।

साड़ी का इतिहास

सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है।
सारी ही की नारी है कि नारी की ही सारी है।

यहां कवि ने साड़ी के वर्णन को खूबसूरत तरीके से पिरोया है । साड़ी एक पहनावा ही नहीं अपितु भारतीय संस्कृति की पहचान है  साड़ी एक ऐसा परिधान है जो प्राचीन काल से स्त्रियों जिंदगी का अहम हिस्सा माना गया है । 5 से 6 फुट का कपड़े से बना ये परिधान बिना सिलाई के चोली और पेटिकोट के साथ पहना जाता है । साड़ी विश्व की सबसे लंबी और पुराने परिधानों में एक है। इसकी लंबाई सभी परिधानों से अधिक है।

इतिहास की माने तो सबसे पहले साड़ी का  यजुर्वेद में  वर्णन हुआ है। इसके बाद  यज्ञ, हवन एवं पूजा (भगवान की आराधना) या किसी भी विशेष त्यौहार के मौके पर भी साड़ी पहनने का अत्यधिक महत्व बताया गया है,और इसे शुभ माना गया है ।
इसीलिए प्राचीन इतिहास में साड़ी को पत्नी के लिए विशेष एवं शुभ परिधान माना गया है।


महाभारत काल में जब दुर्योधन द्वारा भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण करने का प्रयास किया गया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं द्रोपदी की साड़ी को अत्यधिक लम्बा कर उसकी अस्मिता का सम्मान को बचाया था। उसी समय से साड़ी को स्त्री के आत्मसम्मान एवं रक्षा का प्रतीक माना गया है ।


साड़ी पहनने के कई तरीके हैं जो शहरों की भौगोलिक स्तिथि और पारंपरिक मूल्यों और रुचियों पर निर्भर करते है।
भारत में निम्न प्रकार की साड़ी प्रचलित हैं।


इसमें मुख्य रूप से प्रचलित साड़ियां हैं ....


.मध्य प्रदेश की चंदेरी साड़ी, महेश्वरी साड़ी, मधुबनी अंदाजन छपाई में उपलब्ध साड़ी

.असम की मूंगा रेशम साड़ी
. उड़ीसा की बोमकई साड़ी
 .राजस्थान की बंधेजप्रिंटेडसाड़ी.
. गुजरात की गठोडा साड़ी पटौला पैटर्न साड़ी
. बिहार की तसर प्रिंटेड साड़ी, कांथा साड़ी
. छत्तीसगढ़ी कोसा रेशम साड़ी
.दिल्ली की रेशमी साड़ी
.झारखंडी कोसा रेशम साड़ी
.महाराष्ट्र की पैठनी साड़ी
. तमिलनाडु की कांजीवरम साड़ी बनारसी भरवां साड़ियाँ
. उत्तर प्रदेश की तांची साड़ियाँ, जामदानी साड़ी, जामवर
.पश्चिम बंगाल की बालूछरी साड़ियाँ एवं कांथा टंगैल साड़ियाँ हैं।


प्राचीनकाल में साड़ियां भी अलग अलग तरीके से पहनी जाती थी । और अलग अलग स्टेट में अलग तरह से साड़ी पहनने की परंपरा है । साड़ी के पल्लू को भी कई तरह से पहना जाता है जो साड़ी का लुक ही बदल देता है ।


आजकल आधुनिक साड़ियां भी बाजार में प्रचलित है जिसे रेडी टू वेयर साड़ी के नाम से जाना जाता है ।
लहँगा साड़ी और वुलन  साड़ी भी आज महिलाओं की पसन्द है।


साड़ी महिलाओं के सौंदर्य में चार चांद लगा देती है ।साड़ी को बनाने में बहुत ही मेहनत लगती है ,साड़ी बनाने के लिए कपड़े का लगभग 5 से 6 गज लम्बा थान लिया जाता है। इस कपड़े पर सुन्दर प्रिंट में जिसमें साड़ी को प्रिंट किया जाना है, बुनाई की जाती है। बुनाई के साथ-साथ साड़ी में जरी,  मोती, मिरर वर्क गोटा-पत्ती, लेस, मोर प्रिंट आदि की प्रचलित डिजायन की भरावन की जाती है। बुनाई के लिए विभिन्न प्रिंट का संयोजित रूप भी काम में लिया जा सकता है।

अंत में प्रिंट और बुनाई से निर्मित होने वाली सुंदर साड़ी को किनारों से पलटकर साड़ी का रूप दे दिया जाता है। 
साड़ी एक पहनावा ही नही बल्कि स्त्रियों के श्रंगार का भी प्रतीक है ।

अन्तिमा सिंह



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