संघर्ष की मूरत

संघर्ष की मूरत

पैदा होते ही लाद दिया मुझ पर अपेक्षाओ का बोझ,

मेरे कर्तव्यो का मुझे भान कराया जाता रोज़।

नारियां तो बार-बार जता सकती है कि छोडा़ है उन्होने अपना आंगन अपना द्वार,

लेकिन मैं कैसे बयां करूं कि करने को सबका पोषण,

मैने भी तो त्यागा है अपना घर-बार।

चाहे होऊं मैं कितना भी परेशान,

लेकिन प्रवेश करता हूँ मुस्कुराकर, झाड़कर अपनी परेशानियां पायदान।

भर नही सकता आँखो में हरदम नीर,

इसीलिये जल्दी कोई समझ नही पाता मेरी पीर।

माँ कहती जोरू का गुलाम, बीबी कहती श्रवण कुमार,

दोनो को कैसे समझाऊं करता हूँ दोनो से कितना प्यार।

बताना मैं भी बहुत कुछ चाहता हूँ, लेकिन कह नही पाता हूँ।

कितने अच्छे से अपने कर्तव्य निभाता हूँ ये कभी नही जतलाता हूँ।

तुम पुरुष हो, आँसू नही बहा सकते,

लेकिन पुरुष भी होते है संवेदनशील,

पाकर स्नेह का स्पर्श वो भी हैं पिंघल सकते।

जब-जब प्यार का स्पर्श है पाया,

अपने मोतियो को अपने चक्षु-रूपी सीपो में छिपाया।

पुरुष होना नही है इतना भी आसान,

सदैव खडे़ रहना पड़ता है बनकर चट्टान।

माना नारी है त्याग की मूरत,

लेकिन पुरुष भी है संघर्ष की सूरत।

पुरुष हो या हो कोई नारी,

कोई नही है किसी पर भी भारी।

जहाँ होता है दोनो में एक-दूजे के लिये सम्मान और प्यारा,

वहीं खुशहाल जीवन है और सदैव जगमगाता है उनका संसार।

#अनकहे भाव

#अनछुए अहसास

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