सपनों का अंत नहीं है शादी

सपनों का अंत नहीं है शादी

ख़ूबसूरत शायना पर कॉलेज के हर लड़के मरते थें पर वो अपने सपनों को पूरा करने की धुन में इस तरह रमी रहती कि इन फ़िज़ूल की बातों पर बिल्कुल न ध्यान देती। शायना का सपना था कि वो एक डॉक्टर बने और माँ बाप ने भी उसके सपनों को साकार करने में कोई कसर न छोड़ी। 

जब शायना का एडमिशन दिल्ली के एक नामी मेडिकल कॉलेज में हुआ तो शायना के माँ बाप काफ़ी ख़ुश हुए पर लोग रिश्तेदारों का क्या? माँ बाप के दिमाग़ में ये बात डाल दिया कि बड़े शहर जाते ही लड़की हाथ से निकल जाती है। ख़ैर शायना के पिता तो समझदार थें पर माँ, वो एक अनजान फ़िक्र मे हर वक़्त गुम रहती। पिता ने शायना से इस बारे मे जब फ़ोन पर बात की तो वो हँस पड़ी, "ओह ! तभी माँ इतनी इतनी बुझी बुझी दिख रही थी उस दिन जब मैंने वीडियो कॉल किया था। वैसे पापा! आप और माँ इत्मीनान रखो मैं दिल्ली अपने सपनों को साकार करने आई हूँ, आप लोगों के सपनों को तोड़ने नहीं। "


शायना की बात सुन पापा को तसल्ली हो गई और उन्होंने शायना की माँ को भी समझा दिया, पर होनी को तो कुछ और मंज़ूर था। 
कॉलेज से एक दिन जैसे ही शायना स्कूटी से निकली वैसे ही अचानक से एक तेज़ रफ़्तार कार उसके सामने आ गई। शायना की तो डर से चीख निकल गई और वो सड़क पर गिर पड़ी। जब होश आया तो ख़ुद को अस्पताल मे पाया। पैरों मे मामूली खरोंचे आई थी उसे। अस्पताल वालों ने बताया कि कोई अनिकेत नाम का लड़का उसे वहाँ ले कर आया था। शायना के सामने अचानक से उस सांवले लड़के की तस्वीर उभर आई जिसे उसने कुछ दिन पहले ही काफ़ी भला बुरा कहा था क्यूंकि उसने उससे दोस्ती जो करनी चाही थी। खैर शायना अस्पताल से छूट गई और एक दो दिन बाद वो कॉलेज भी जाने लगी।

पर कॉलेज मे उसकी निगाहें अनिकेत को ही सिर्फ़ ढूँढ़ती। शायद वो छुट्टी पर था। एक दिन जब वो दिखा तो शायना भाग कर उसके पास गई और उसका शुक्रिया अदा किया और उसकी तरफ़ दोस्ती का हाथ बढ़ाया। अनिकेत जो पहले से ही शायना के प्यार के गिरफ्त मे था, शायना के पहल को इंकार न कर सका।  नादान शायना शायद इस बात से अनजान थी कि दोस्ती कभी कभी प्यार मे भी तब्दील हो जातीं है और फिर धीर धीरे दोनों के दोस्ती का रंग गहरा होता चला गया। कॉलेज का अंतिम साल आते आते शायना को ये एहसास हो चला था कि वो अनिकेत के प्यार मे पड़ चुकी है, पर माँ पापा को दुःखी करने का एहसास उसे अंदर ही अंदर काफ़ी डरा देता। उधर शायना के माँ पिता भी शायद शायना के दिल का हाल समझ चुके थें क्यूंकि शायना के हर बात मे अनिकेत का ज़िक्र होता था। 


अंतिम वर्ष का एग्जाम होने वाला था और शायना मन ही मन अनिकेत से जुदा होने के ख़्याल मात्र से सिहर जातीं उधर अनिकेत भी गुमसुम रहना लगा क्यूंकि वो भी जानता था कि शायना अपने माँ बाप कि मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं कर सकती। एक दिन अचानक से दरवाज़े पर दस्तक हुई। अनिकेत के ख़्याल मे गुम शायना  ने  दरवाज़ा खोला। "अनिकेत ! तुम....."पर सामने माँ पापा को देख झेंप गई। वो.... माँ...... आप सब यहाँ? सब ठीक तो है? 

सब ठीक है पर शायद तुम ठीक नहीं हो। हम जानते हैं कि तुम अनिकेत से बहुत प्यार करती हो पर हमारा ख़्याल कर कुछ कह नहीं पाती।  पर बेटा हम तेरे माँ बाप है। हमने हमेशा चाहा कि तू ख़ुश रहें। हम ने तुझे बेराह होने से रोका है न कि शादी करने से। वो तो अच्छा हुआ कि अनिकेत अपने माँ बाप को लेकर ख़ुद हमारे घर आया और तेरा हाथ माँग लिया वरना तू तो शायद अपनी दिल की बात हमें कभी नहीं पाती। बेटा प्यार करना गुनाह नहीं पर प्यार मे ग़लत राह इख़्तियार करना ज़रूर गुनाह है।और हाँ ! शादी  सपनों का अंत नहीं कर सकती बशर्ते जीवनसाथी साथ दे और मुझे यक़ीन है कि अनिकेत हर मोड़ पर तेरे साथ रहेगा। अब चलो ख़ुश हो जाओ और फाइनल एग्जाम की तैयारी करो और हाँ इस एग्जाम के बाद तेरी शादी है। 
शायना खुशी से माँ बाप के गले लग गई। 

सच है,  सच्चा इश्क़ जीत ही जाता है !

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