ससुराल में मेरा पहला दिन

ससुराल में मेरा पहला दिन

बात मेरे ससुराल के पहले दिन की है।मेरी शादी 3 वर्ष पूर्व 28 फरवरी 2017 को हुई थी।हम लड़की वाले वृन्दावन से कोलकाता शादी करने आये थे।शादी पूरी तरह से मारवाड़ी तरह से हुई।

कोलकाता की शादी उत्तर भारत की शादी से बिल्कुल उलट होती है।उत्तर भारत मेंं शादी शुरू ही रात 9 या 10 बजे से होती है।बारात ही रात को 9-10 बजे तक आती है और सुबह तीन या चार बजे फेरे होते हैं जबकि कोलकाता कोई भी समुदाय चाहें बंगाली हो,बिहारी हो या राजस्थानी सभी को रात को बारह बजे से पहले तक ही शादी निपटानी होती है।शादी का हॉल या ग्राउंड की रात को बारह बजे तक ही होती है।

शादी की रस्में होने के बाद रात को डेढ़ बजे मेरी विदाई हो गई।अपने परिवार को छोड़ दूसरे परिवार को अपनाने के लिए मैं पिया के साथ ससुराल आ गई।रात को मम्मी(सासूमाँ) ने एक नाइटी देते हुए कहा सुबह से लहंगा पहने हो।इसे बदल लो और सो जाओ।बहुत ज्यादा थकी होने के कारण भी मुझे नींद भी नहीं आ रही थी।करीब चार बजे मैं सो गई और फिर सुबह छः बजे मैंं उठ गई।नया माहौल होने के कारण,नये रिश्ते होने के कारण कुछ समझ में भी नहीं आ रहा था।मैं नहाकर जब आई तो मम्मी बोली शादी का लहंगा दुबारा पहन लो।मैंने तैयार होने के लिए जैसे ही कॉस्मेटिक निकालने के लिए बैग माँगा।ससुराल में सभी मेरा बैग ढूंढने लगे पर बैग ही नहीं था।खैर उस वक्त मेरे छोटे बैग में लिपस्टिक और काजल,कुछ हल्का-फुल्का सामान था काम चल गया।ससुराल में शादी का जोड़ा पहनकर मंदिर जाते हैं।हमेंं 2-3 मंदिर ले जाया गया।पूूूजा करके हम घर आ गये।

मम्मी बोली आज के दिन मायके की साड़ी पहनते हैं पर घर आकर पता पड़ा बैग हाउस में ही छूट गया।इतने में मेरी मम्मी का भी फोन आ गया कि तुम्हारे कपड़ों का बैग यहींं छूट गया। मेरे ससुराल की तरफ से चढ़ाई कुछ साड़ियां भी उसी बैग में थी।जो ससुराल में साड़ियां मेरे लिए चढ़ाई गईंं वो काली,नीली थीं जो कि पहन नहीं सकते थे।वहीं गैस्ट हाउस भी ससुराल से काफी दूर था।कौन जाता या आता।तबतक ताई चाचियां भी आ गई।अब मुझे लंहगा बदल कर साड़ी पहननी थी।ब्लाउज भी नहीं था।मेरी नंद ने लहंगे के ब्लाउज से मिलती हुई गोटा वर्क पीली की साड़ी दी।साड़ी मेरे लहंगे के ब्लाउज़ से एकदम परफेक्ट कर रही थी।

अब थी परेशानी साड़ी कैसे पहनूं?साड़ी कंधे पर पिन अप कर ली पर सामने की प्लेट कैसे बनेगी?सासूमां ने प्लेट बना दी पर वो भी नहीं पहना पाईं बहुत फिसलने वाला कपड़ा था।तब चाची सास ने मुझे साड़ी पहनाई।घर पर सब रिश्तेदार आ चुके थे।रस्में शुरू हुईं।

मुझे एक ऊँचे पाटे पर बैठाया गया।मारबाड़ी रस्म के अनुसार नंद ने मेरी चोटी बनाई।सासू मां ने खाना खिलाया।अँगूठी खेलने की रस्म हुई और तीनों बार अपने पति को हराकर मैंं जीती।शाम तक सभी रिश्तेदार जा चुके थे।

मैं पगफेरे की रस्म के लिए अपने भाइयों का इंतजार कर रही थी।मेरे दोनों भाई घर आये और मैं पति और भाइयों के साथ गेस्टहाउस आ गई थी।मम्मी-पापा को मिलकर गले लगा लिया।सभी रिश्तेदारों से मिली। मैं बहुत खुश थी।मेरी बहन कमरे में ले गई।मुझे मायके की साड़ी पहनाई,मेकअप किया।खाना पीने के बाद रस्मों को निपटा अब विदाई की बारी थी...मेरा दिल अब बैठा जा रहा था।अब तक रस्म और शादी के कारण कुछ पता न पड़ा।

कल सभी वापिस लौट जायेंगे।जब वृन्दावन से आये थे हम सभी साथ आये पर अब मुझे छोड़ सब चले जायेंगे।मेरे मम्मी पापा जिन्होंने पाला पोसा,पढ़ाया-लिखाया,मेरे लिए अच्छे बुरे फैसले लेते रहे पर आज अब से मैंं उनके लिए पराई हो गई।मम्मी बोल रही थी ये सामान रख लेना,वो बैग रख लेना।मैं अब रो रही थी।मेरे अपने सगे-सम्बंधि,रिश्ते पीछे छूट रहे थे।मेरे भाई बहन जो हमदर्द थे हम राज थे पीछे छूट रहे थे।क्या सच में मैं पराई हो गई।आज हमारे अपने जो अजीज थे।एक पल में पराई हो जाऊँगी।क्यों लड़कियाँ ही विदा होती हैं?मैं सबसे गिले मिल रो रही थी।

आज वह सब महसूस हो रहा था जो अब तक सुनती आई थी।अजीब सी पीड़ा जिसको शब्दों में बयां नहीं कर सकते हैंं।यह रस्म क्यों बनाई?जब भी उस दिन को याद करती हूँँ तो बस एक तरफ खुशी होती है कि जिस साथी का इंतजार था वह तो मिल गया पर एक गहन पीड़ा जीवन के दाता बिछड़ रहे हैंं,,,,,और फिर आ गई मैं अपने ससुराल, कई अनगिनत सपने और यादेंं, हँसी ,खुशी ,गम जो मैंने अपने माँ-पापा के साथ जिए।सच-

बाबुल मेरा नैहर छूटो जाए.....इससे ज्यादा शायद और न लिख पाऊँ।

आपकी सखी

राधा गुप्ता 'वृन्दावनी'

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