स्त्री एक किरदार अनेक

स्त्री एक किरदार  अनेक

"स्त्री" शब्द अपने में पूर्णता लिए  हुए है, जीवन के हर पड़ाव में स्त्री बेटी से शुरू हुए सफर निरंतरता देते हुए मां तक जाती है। स्त्री पैदा होते के बाद एक बेटी बनकर घर में चिड़िया की तरह चहकते हुए रौनक फैलाती है, जिस घर में उसकी जड़े समाई होती हैं, परिपक्व होने पर वह  दूसरे घर की छायादार वृक्ष बन जाती है। दो कुलों की रीत निभाने वाली केवल एक स्त्री ही होती है।
बेटी, पत्नी ,बहू, मां हर केदार  को वह दिल से निभाती है, अपने घर- परिवार के लिए अपना पूरा जीवन निस्वार्थ भाव से समर्पित कर देती है।
मां को शिशु का पहला गुरु माना जाता है। मां स्त्रीत्व का एक अद्भुत व्यक्तित्व है वह अपना दुख दर्द भूल कर अपने शिशु की देखभाल करती है और शिशु सबसे पहला शब्द मां ही बोलता है, मां अपने बच्चे को इस सृष्टि से रूबरू कराती है, बच्चा अपनी मां की आंखों से ही पहली बार इस दुनिया का दर्शन करता है, मां कब एक गुरु बन जाती है पता ही नहीं चलता।
स्त्री पुत्री रूप में अपने सारे कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए हैं संस्कारी ,आज्ञाकारी संतान होने की हर भरसक कोशिश करती है ।पुत्री रूप में स्त्री अपने घर आंगन को हरदम महकाती  तथा चेहकाती रहती है, जहां पैदा हुई ,बड़ी-पढ़ी ,एक दिन  अपनी प्रीतम की संगिनी बन अपना पूरा जगत छोड़कर, एक नई दुनिया में प्रवेश करती है।
पत्नी रूप में स्त्री अपने भविष्य के लिए अपने कई खुशनुमा पल को ससुराल की दहलीज में छोड़ आती है। इतना बड़ा त्याग केवल एक ही स्त्री ही कर सकती है। क्योंकि वह स्वयं में एक शक्तिपुंज है। जो निरंतरता को आसानी से स्वीकार कर लेती है।
नए परिवेश को अपनाकर अपने परिवार को एक छाया रूपी वृक्ष की तरह संभाल कर रखती है।
स्त्री कब पुत्री से पत्नी, बहू के रूप को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बना लेती हैं और एक नए जीवन का पुनः आरंभ करती है या हम कहें फिर से एक नया जीवन जीती है।
मां के रूप में शिशु के साथ स्त्री का फिर से एक जन्म होता है। निस्वार्थ प्यार, सेवा से वह अपने शिशु का पालन पोषण करती है।
मां से दादी- नानी के नए केदार के साथ फिर से जीवन की गोधूलि बेला को जीती है।
स्त्री एक ऐसा व्यक्तित्व है जो खुद को भूल कर सृष्टि (घर संसार)को सुंदर बनाने के लिए एक देवी के समान कई बार दुर्गा, काली, सरस्वती का रूप धारण करती है ताकि उसका परिवार संपन्नता व उन्नति को प्राप्त करें और हर बाधाओं से दूर रहें।
स्त्री फिर भी इस पुरुष प्रधान समाज में दूसरी श्रेणी में क्यों आती है? क्यों वह कई बार शोषित होती है।  क्या इसके लिए स्त्री ही उत्तरदाई है?
 बहुत से लोगों का मानना है कि स्त्री ,स्त्री की दुश्मन बन जाती है जिसके कारण स्त्री का शोषण होता है। आपसी  ईर्ष्या -द्वेष  से जन्मा  हुआ  भाव स्त्री को ही प्रभावित करता है, जहां एक और स्त्री घर की नींव मानी जाती है वही वही स्त्री घर को ध्वस्त करने वाली भी मानी जाती है, ऐसा केवल विचारों का असंतुलन के कारण होता है।
एक इंसान होने के नाते स्त्री जहां देवी का रूप बनकर घर परिवार को अपनी छत्रछाया प्रदान करती है जिस  से   घरों में समृद्धि तथा सुख शांति बनी रहती है, वहीं दूसरी ओर विचारों में कुंठा आने के कारण शोषण का परिचायक भी बन जाती है। और समाज में स्त्री के दयनीय स्थिति का आधार।
स्त्री एक गुरु के रूप में भी जानी जाती है जब कोई संतान कुछ गलत करता है तो गुरु के नाते स्त्री में इतनी शक्ति होती है कि वह अपनी संतान को अधर्म करने से रोक सके, अपनी बहू- बेटियों को अपनी शक्ति का सकारात्मक रूप में प्रदान करें ताकि नकारात्मकता का वर्चस्व ही समाप्त हो जाए और कोई भी स्त्री शोषित ना हो। इस प्रकार से अगर एक स्त्री घर का आधार स्तंभ बन जाए तो महिलाओं पर हो रहे शोषण, अपराध बहुत हद तक कम हो जाएंगे। नारी शक्ति के उत्थान के लिए नारी का एकजुट होना अति आवश्यक है। इस सृष्टि में स्त्री  ही अपने जीवन में कई पड़ाव से होकर गुजरती है अगर स्त्री हर पड़ाव में अपनी शक्ति का प्रयोग सकारात्मक रूप से करें तो यह सृष्टि और भी सुंदर और समृद्ध हो जाएगी।

#उत्सव के रंग

#स्त्री के रूप अनेक

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