सुधा मूर्ति जिन्होंने पढ़ने के लिए किया था तीन शर्तों का सामना

जिन्दगी एक इम्तिहान है, जिसका पाठ्यक्रम पता नहीं होता और जिसके सवाल भी तय नहीं होते न कोई मॉडल पेपर होता है”

सुधा मूर्ति जिन्होंने पढ़ने के लिए किया था  तीन शर्तों का सामना

जिन्दगी एक इम्तिहान है, जिसका पाठ्यक्रम पता नहीं होता और जिसके सवाल भी तय नहीं होते न कोई मॉडल पेपर होता है”

ये बात सूधा मूर्ति के द्वारा कही गई है, सुधा मूर्ति जिन्होनें अपनी सादगी और समझदारी के बल पर सफलता हासिल की है।
 इसके साथ ही वे आज लाखों महिलाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनी हुईं हैं।
सुधा का जीवन में एक लक्ष्य है कि उन्हें एक नेक इन्सान के रूप में याद किया जाए. वे छोटी-छोटी चीजों में खुशी खोजती हैं और मानती हैं कि सरल होना और दिल का धनी होना महत्वपूर्ण है.
 उनका जीवन  कर्मठता का प्रमाण रहा है वे दूसरों से मीलों आगे निकल गई हैं उनका जीवन एक आदर्श है ।
सुधा मूर्ति ने अर्नेस्ट हेमिंग्वे के इस कथन को साकार कर दिखाया है कि ‘अँधेरे में रहने से बेहतर है कि एक मोमबत्ती जला लें.’
कॉलेज में 599 लड़कों के बीच सुधा मूर्ति  अकेली लड़की थीं, तब माना जाता था कि गणित  लड़कों का विषय  है और इंजीनियरिंग 
 में लड़के ही आएंगे. ऐसे में कॉलेज में टॉयलेट (toilet) भी सिर्फ लड़कों के लिए ही था।

दाखिले के लिए सुधा बी.वी.बी.कालेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी पहुंची तो प्रिंसिपल ने 3 शर्तें रखीं......

इनमें पहली थी कि सुधा को ग्रेजुएशन खत्म होने तक साड़ी में ही आना होगा।
 दूसरी शर्त के तहत सुधा का कैंटीन जाना मना था। 
 तीसरी शर्त थी कि सुधा कॉलेज के लड़कों से बात नहीं करेंगी. 

सुधा जी अक्सर इस वाकये का जिक्र करते हुए बताती हैं कि पहली दो शर्तें तो पूरी हो गईं लेकिन तीसरी शर्त खुद उनके कॉलेज के लड़कों ने पूरी नहीं होने दी. जैसे ही सुधा ने फर्स्ट ईयर में टॉप किया, सारे लड़के खुद उनसे बात करने आने लगे. इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की स्नातक में सुधा पूरे कर्नाटक में प्रथम रहीं।
4 सालों की परेशानी का नतीजा रहा कि इंफोसिस शुरू करने के बाद सुधा ने 16 हजार से भी ज्यादा टॉयलेट पूरे देश में बनवाए।
स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने जे.आर. डी.टाटा को पोस्टकार्ड लिखा था और उसमें यह शिकायत की थी कि ‘टाटा मोटर्स’ में लिंग पक्षपात किया जाता है, क्योंकि वहां केवल पुरूषों को ही नौकरी दी जाती है. इस शिकायत के कारण ‘टाटा मोटर्स’ के अधिकारीयों ने उन्हें इस विषय पर लंबी चर्चा के लिए बुलाया, सुधा ने ‘टेल्को’ में एक ग्रेजुएट ट्रेनी के रूप में अपना कैरियर आरंभ किया. 
सुधा कुलकर्णी कंपनी के शाप-फ्लोर अर्थात कारखाने में पहली महिला इंजीनियर बनी ।
वे एक सामाजिक कार्यकर्ता, इंजीनियर, एक संवेदनशील शिक्षक तथा एक अत्यंत कुशल लेखिका भी हैं. अन्य कामों के साथ-साथ उन्होंने कर्नाटक में सभी सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर तथा पुस्तकालय सुविधाएँ मुहैया करने का भी कदम उठाया है।
उन्होनें अपनी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखें है और काफी जोखिमों के बाद जीत हासिल की है।सुधा मूर्ति एक बेहद प्रभावशाली लेखिका भी हैं और सुधा मूर्ति ने अपने जिंदगी के अनुभवों को किताबों के माध्यम से साझा किया है। उन्होंने आम आदमी की पीड़ाओं को अभिव्यक्ति देते हुए आठ उपन्यास भी लिखे हैं। इन सभी उपन्यासों में महिला किरदारों को बेहद मजबूत और सिद्धांतों पर अडिग दर्शाया गया है।
इसके अलावा उन्होनें तकनीकी किताबें, यात्रा, छोटी कथाओं के संग्रह और गैर-काल्पनिक टुकड़े, और बच्चों के लिए भी अंग्रेजी और कन्नड़ भाषा में किताबें लिखी हैं।
आपको बता दें कि सुधा मूर्ति की किताबों का अनुवाद सभी मुख्य भारतीय भाषाओं में किया गया है। सुधा मूर्ति को साहित्य के लिए नारायण अवॉर्ड और साल 2006 में पदम श्री से भी नवाजा जा चुका है, इसके अलावा कर्नाटक सरकार ने भी साल 2011 में सुधा मूर्ति को कन्नड़ साहित्य में उत्कृष्टता के लिए अटिमाबे पुरस्कार से सम्मानित किया था।


उन्होंने जीवन के हर मोड़ पर ऐसा कुछ किया, जो इतिहास बन गया।

अनु गुप्ता

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