सुधा मूर्ति, मेरी मनपसंद लेखिका

सुधा मूर्ति, मेरी मनपसंद लेखिका

कई भाषाओं में अनेकों किताब लिख चुकीं सुधा मूर्ति ना सिर्फ एक लेखिका है बल्कि अपने सामाजिक कार्य के लिए भी बखूबी जानी जाती हैं।

सुधा मूर्ति का जन्म 19 अगस्त 1950 में कर्नाटका में हुआ था। बचपन से ही पढ़ने लिखने में तल्लीन सुधा मूर्ति आगे चलकर टेल्को में काम करने वाली पहली महिला इंजीनियर बनी। उनका हमेशा सही है सपना रहा कि ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर बना सकें। उनका ग्रामीण इलाकों में साफ सफाई, साक्षरता आदि के प्रति प्रयासों को दुनिया भर में देखा गया और सराहा भी गया है।

सुधा मूर्ति एक बेहतरीन लेखिका है और उनकी किताबों का देश की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद होता आया है। उन्हें आर के नारायण अवार्ड भी मिल चुका है साहित्य के लिए और 2006 में पद्मश्री से भी नवाजा गया है। 
सुधा मूर्ति मूलतः अंग्रेज़ी और कन्नड़ में लिखती है। हर आयु वर्ग के लिए उनके पास कहानियां और किताबें है। उनकी कहानियो ने मुझे हमेशा से प्रभावित किया है। 
मैंने उनकी वह किताब भी पढ़ी हाउ आई टॉट माय ग्रैंड मदर टू रीड जिसे लगभग 15 भाषाओं में अनुवाद किया गया है। उनकी किताब डॉलर बहू पर तो सीरियल भी बन चुकी है। यह था उनका जीवन परिचय। अब प्रश्न यह है कि मुझे सुधा मूर्ति किस तरह से प्रभावित करती हैं? यह ना सिर्फ उनकी लेखन कला है बल्कि समाज के प्रति और महिलाओं के प्रति उनके किए जाने वाले अथक प्रयासों का भी असर है जो मुझे उनकी तरफ आकर्षित करता है। 
जैसा कि वह कहती है कि जिंदगी एक ऐसी परीक्षा है जिसका सिलेबस हमें पता नहीं और क्वेश्चन पेपर उसके सेट नहीं रहते हैं, बस जिंदगी आपकी अचानक परीक्षा लेती रहती है इसके लिए आपको हर समय तैयार रहना होता है। उनकी ऐसी ही सोच मुझे जीवन में ऊर्जा प्रदान करती है। मेरे लेखन में भी उनके द्वारा दी गई सीखो को मैं समाहित करने का प्रयास करती हूं। वह कहती हैं कि कहानी ऐसी होनी चाहिए जो पढ़ने वालों को सकारात्मक दिशा में ले जाए, उसमें उम्मीद होनी चाहिए, खुशी होनी चाहिए, जीवन संदेश होना चाहिए और ऐसा कुछ जो पाठक की कल्पना शक्ति को पंख दे सके, उड़ान दे सकें। जो दुनिया हमारे पास है उसे तो हम बदल नहीं सकते, पर जो दुनिया हमारी कहानियों में है हम उसे तो अच्छा बना ही सकते हैं। सुधा मूर्ति को जितना प्यार किताबों से है उतना ही वह सिनेमा से भी प्यार करती हैं और ढेर सारी मूवीज देख चुकी है। उनकी यह बात मैं खुद से रिलेट कर पाती हूं। उनकी किताबों की भाषा को बेहद आसान होती है और आसानी से दिल तक पहुंचती है। उनकी एक बात अच्छी लगती है कि इंफोसिस की को फाउंडर और नारायण मूर्ति की पत्नी होने के नाते नहीं बल्कि खुद सुधा मूर्ति होने के नाते उनकी किताबें बिकती है और लोग उन्हें पढ़ते हैं। उन्हें लोग उनके काम से जानते हैं ना कि उनके नाम से। बस यही बात मैं भी एक महिला होने के तौर पर हमेशा से चाहती हूं कि हर महिला का अपना नाम हो, अपनी पहचान हो जिससे वह जाने जाए। 
आज भी सुधा मूर्ति अपने सामाजिक कार्य में लगी हुई है और यह प्रेरणादायी है कि आप अपने साथ साथ पिछड़े समाज को भी लेकर चलते हैं। वह एक लेखिका भी हैं और आम आदमी के जनजीवन को सुधार के लिए उन्होंने बहुत काम किया है। उनकी शुरू से कोशिश करी कि सरकारी स्कूलों में कंप्यूटर एजुकेशन और लाइब्रेरी की सुविधा भरपूर मात्रा में हो क्योंकि जब ग्रामीण भारत शिक्षित होगा तभी संपूर्ण भारत आगे बढ़ सकता है।
यूँ तो इतिहास से लगभग हर लेखिका ने मुझे प्रभावित किया है पर मैं वर्तमान में जीना जानती हूं और भविष्य के प्रति सकारात्मक रवैया रखते हुए समसामयिक परिस्थितियों में सुलझ कर रहना चाहती हूं बस इसलिए मैं समकालीन लोगों के जीवन से सीखने का प्रयास करती हूं क्यूँकी वही व्यावहारिक भी रहेगा।

#इतिहास से मेरी मनपसंद लेखिका

#शिक्षक दिवस प्रतियोगिता

#ThePinkComrade

-सुषमा तिवारी 

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