सुपर 30 एक माॅटिवेशनल कदम

सुपर 30 एक माॅटिवेशनल कदम

 ''सुपर 30'' एक माॅटिवेशनल कदम
  #बॉलीवुड तड़का 
 #ब्लॉग प्रतियोगिता 
  #ThePinkComrade 


देश की बढ़ती जनसंख्या सबसे बड़ी समस्या है। जिसके कारण देश में गरीबी और अशिक्षा का विस्तार होता है। सबको उनके अनुसार शिक्षा का हक नहीं मिल पाता है। गरीब-अमीर वाले वर्ग में अमीर तो अपना हक पा लेते हैं लेकिन गरीब, जो विद्वान तो है लेकिन उसके पास उसके लिए पैसा नहीं है, अपनी प्रतिभा को निखारने से वंचित रह जाता है ।
गन्दगी, कीचड़ और गटर के आसपास रहने वाले साधनहीन और गरीबी की मार झेल रहे बच्चे सपना भी नहीं देख सकते हैं कि वे आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में सफल होकर एक अच्छा जीवन जी सकेंगे। 
 ऐसे बच्चों को मुफ्त में शिक्षित करने और उनके रहने, खाने-पीने का खर्चा उठाकर उन्हें आगे बढ़ाने का काम  जब एक इंसान करता है ,तो एक सपना सा लगता है।
          सुपर 30 में यही सब दिखाया है कि पढ़ाई का क्या महत्व है और किस तरह से पैसे को महत्व न देकर अगर शिक्षक सिर्फ पढ़ाई पर भी ध्यान दें , तो कोई भी  प्रतिभावान वाला बच्चा पीछे नहीं रह सकता । वह भी एक गंदगी से उठकर अपने उनके मुकाम पर पहुंच सकता है। 
 बिहार के रहने वाले आनंद कुमार ने यह अद्‍भुत काम किया और उनके द्वारा तैयार किए गए बच्चे आज ऊंचे पदों तक पहुंच गए हैं। आनंद कुमार सही मायनो में सुपरहीरो हैं। सुपरहीरो बनने के लिए बेहतरीन लुक्स नहीं, काम मायने रखता है। 
इस इंसान के प्रति सम्मान तब और बढ़ जाता है जब यह पता चलता है कि वह खुद गरीबी की मार झेल रहा है।
 फिल्म 'सुपर 30' निर्देशक विकास बहल ने बनाई जो एक व्यक्ति के संघर्ष और जीत को दर्शाती है।   

फिल्म की कहानी
सुपर 30 फिल्म की शुरूआत फ्लैशबैक के साथ होती है। आनंद कुमार एक अच्छे स्टूडेंट हैं। आनंद कुमार यानी ऋतिक रोशन का एडमिशन के लिए क्रैबिंज यूनिवर्सिटी में नंबर आ जाता है। लेकिन आनंद कुमार एक गरीब परिवार में पले-बड़े होते हैं इसलिए हालात इतने खराब होते हैं कि यूनिवर्सिटी ने वह दाखिला नहीं ले पाते। आनंद कुमार के पिता की अचानक मौत के बाद घर के हालात और खराब हो जाते है। आनंद को मां के हाथों बने पापड़ बेचकर घर चलाना पड़ता है। कहते हैं वक्त सबका बदलता है आनंद कुमार का भी बदला। आनंद कुमार को लल्लन सिंह का साथ मिल जाता है और फिर सफर शुरू होता है अच्छे दिनों का। लल्लन आईआईटी की तैयारी कर रहे बच्चों के लिए एक कोचिंग सेंटर चलाता है और आनंद को बतौर टीचर शामिल कर लेता है। हालांकि जब आनंद को एहसास होता है कि उसके जैसे कई बच्चे  आर्थिक तंगी के चलते अपने सपनों का बलिदान कर रहे हैं तो वो अपनी कंफर्टेबल जिंदगी को छोड़कर फ्री कोचिंग सेंटर खोलता है।
 इस फिल्म में दिखाया गया है कि कई बार टेलेंट और मेहनत हालात के आगे हार जाते हैं लेकिन सिकंदर वही होता है जो हालात और वक्त को अपनी मुठ्ठी में करके जीत जाए। आनंद कुमार भी सिकंदर है। जिन्होंने अपने हालात से कभी समझौता नहीं किया बस मेहनत करके आगे बढ़े। 
आनंद कुमार के संघर्ष, गरीबी, इंटेलीजेंसी को बहुत अच्छे से व्यक्त किया है। 
उस सीन में रितिक का अभिनय देखने लायक है जब उन्हें पता चलता है कि उनके द्वारा पढ़ाए गए सभी बच्चें आईआईटी के लिए चुन लिए गए हैं। 
बिना कोई संवाद बोले रितिक ने केवल अपने एक्सप्रेशन्स से इस सीन को यादगार बना दिया है। 
         आज हमारे देश को ऐसे ही शिक्षकों की जरूरत है। जो पैसे को महत्व न देकर पढ़ाई को महत्व देते हैं ।"जो कोयले में से भी हीरे को छाँट लेते हैं ",और ऐसे ही विद्यार्थी होने चाहिए कि अगर हमें शिक्षक अपने पूरे तन, मन, धन से हमें पढ़ाई करा रहा है, तो हमें भी उसमें सुपर रहना चाहिए कुल मिलाकर मुझे इस मूवी नेे बहुत ज्यादा माॅॅॅटिवेशन करा ।


 


 

 

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