सूरत शहर से मिली मुझे लेखिका के रूप में एक नई पहचान

सूरत शहर से मिली मुझे लेखिका के रूप में एक नई पहचान

सूरत शहर से मेरी बहुत सी यादें जुड़ी हैं,क्योंकि एक लंबा वक्त गुजारा है,इस शहर में।

आज भी मुझे याद है वो दिन,जब एक स्थानीय हिंदी न्यूज पेपर लोकतेज में होली के पर्व पर एक प्रतियोगिता के आयोजन का विज्ञापन छपा थ।इस प्रतियोगिता में कोई भी भाग ले सकता था।उम्र की सीमा नहीं थी।विषय होली पर कविता या कोई स्वरचना लिखनी थी।पुरस्कार सिर्फ एक ही को मिलना था,वो भी सोने की चेन।जरा सोचिए,सोने की चेन जैसा पुरस्कार कौन नहीं जीतना चाहेगा..? ऐसी ही चाहना मेरे मन में भी हुई पर मुझे कविता लिखना आता ही नहीं था।कविता तो छोड़ो,लेखन से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था।हाँ बचपन में माँ किसी को भी पत्र लिखना होता था,तो वो मुझसे ही लिखवाती थीं।बस वो ही दो चार रटी रटाई पंक्तियाँ होती थीं..'आशा है आप सब वहाँ कुशलपूर्वक होंगे..?,हम सब भी यहाँ राजी खुशी से हैं,बड़ों को नमस्ते,छोटों को प्यार।" इससे ज्यादा कुछ नहीं।बड़े होने पर पोस्ट ग्रैजूएशन भी रसायनशास्त्र में किया।पति भी टेक्निकल क्षेत्र से थे।

बचपन से ही स्वभाव से कोमल और भावुक थी,शायद इस गुण की वजह से मन में भावनाएं कूट-कूटकर भरी थीं।इन्हें कागज पर उड़ेलने का प्रयास कभी नहीं किया था।पर ना जाने इस बार क्यों मन से ये आवाज आ रही थी कि,मैं भी कुछ लिखूँ..!! लग रहा रहा था, "सोने की चेन" के रूप में मुझे मेरी मंजिल लुभा रही थी।एक दिन बस ठान ली लिखने की ओर बैठ गई कागज कलम लेकर।कितने ही कागज लिख-लिखकर फाड़ डाले।कुछ समझ नहीं आ रहा था,कहाँ से शुरूवात करूँ ? समय भी कम मिलता था।दिन भर घर के काम काज व बच्चो की देखभाल में निकल जाता,शाम को पति के ऑफिस से लौटने का समय हो जाता और फिर चाय,रात का खाना। यूँ ही दिन गुजरते जा रहे थे।रचना भेजने की अंतिम तिथि नजदीक आ रही थी,अभी तक तो मेरी एक पंक्ति भी नहीं लिखी गई थी।मुझे तो सोते जागते बस वो 'सोने की चेन' ही नजर आती थी।एक दिन सुबह उठते ही से मैंने सोच लिया कि आज कुछ भी हो जाए,मैं अपनी रचना लिखकर ही मानूँगी।दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर एकांत में बैठ गई,फिर मन को एकाग्र करके प्रतियोगिता के विषय पर विचार किया।चूँकि विषय होली का पर्व था,अतः होली पर हम पर क्या-क्या करते हैं,अर्थात कब ? ,क्यों.? और कैसे मनाते हैं ये त्योहार इन सब बातों को ध्यान में रखकर मैंने लिखना शुरू किया।कड़ी से कड़ी जुड़ती गयी और शाम होते-होते तक मेरी कविता को एक आकार मिल गया।फिर मैंने कविता को एक बार फिर,दो बार और कई बार पड़ा,लगा अभी ये रचना प्रतियोगिया की कसौटी से दूर है,इसमें कुछ अधूरा सा है।मेरी एक अच्छी या बुरी आदत कहो,में जिस भी कार्य को हाथ में लेती हूँ,तब तक चैन से नहीं बैठती जब तक वो पूरा नहीं हो जाता।मुझे ड्रॉइंग पेंटिंग से भी बहुत लगाव था।अपनी पेंटिंग को भी रंगो से तब तक सजाती रहती थी जब तक वो जीवंत नहीं दिखती थीं।अपनी कविता को भी में ऐसा अंतिम रूप देना चाहती थी अर्थात ऐसी पंक्तिया लिखना चाहती थी,जो मेरी कविता को पूर्णता की ओर ले जाए।इसी उधेड़ बुन में थी कि क्या लिखूँ.? मेरे दिमाग़ में एक विचार आया और उसे मेने पंक्तियों का रूप दे दिया।बस मेरी कविता पूर्ण हो गई।पति जब शाम को ऑफिस से आए तो,उन्हें मैंने अपनी कविता पढ़कर सुनाई।उन्हें बहुत पसंद आई।दूसरे दिन कविता न्यूज पेपर के कार्यालय में भिजवा दी।

होली का दिन था,में सुबह-सुबह उठ गई ताकि सबसे पहले पेपर में पढ़ सकूँ।क्योंकि होली के दिन ही सभी प्रतियोगियों की प्रविष्टियाँ पेपर में छपनी थी।धड़कते दिल से दरवाजा खोला,पेपर उठाया और सोफे पर आकर बैठ गई।छुट्टी का दिन था,सब सो रहे थे अतः मैं आराम से पेपर पढ़ने लगी।अंतिम पृष्ठ पर सभी प्रतियोगियों की रचनाएं उनके नाम के साथ छपी थीं।मैंने उस पृष्ठ को ऊपर से नीचे दो तीन बार पढ़ा,पर मुझे अपना नाम व कविता कहीं नजर नहीं आई।हाँ कुछ ऐसे लोगों के नाम व रचनाएं नजर आईं,जिनके लेख व कविताएं आए दिन उस पेपर में छपते रहते थे।सोचा,शायद इन लोगों की रचनाओं के मुकाबले मेरी कविता आयोजकों को पसंद ना आई होगी।इतने में पृष्ठ के नीचे एक कोने पर मेरी नजर गई,वहाँ किसी प्रतियोगी द्वारा लिखित पंक्तिया छपी थीं-

डिब्बे में डिब्बा,डिब्बे में मिठाई,

आप सबको,होली की बधाई।

इन पंक्तियों को पढ़कर हँसी भी आई और ग़ुस्सा भी,लगा इससे तो मेरी कविता कई गुना अच्छी थी।पर क्या कर सकती थी?मन मसोस कर रह गई।दूसरे दिन पेपर नहीं आया था।दोपहर के १२ बजे थे,न्यूज पेपर के कार्यालय से फोन आया कि-प्रतियोगिता की विजेता में बनी हूँ।उन्होंने मुझे कार्यालय बुलाया था पुरस्कार लेने के लिए।मैं तो सुनकर खुशी से झूम उठी थी।मैंने सपने में भी नहीं सोचा था,कि मैं कभी कुछ लिखूँगी और मुझे प्रथम पुरस्कार मिलेगा।यानी पहली बॉल पर ही छक्का।

दूसरे दिन मेरी कविता,मेरे पुरस्कार लेते फ़ोटो के साथ छपी।दिन भर बधाइयों के फोन आते रहे,मैं अपने आपको बहुत गौरवान्वित महसूस कर रही थी।

इसके बाद तो कविताओं व लेख लिखने का सिलसिला शुरू हो गया।पुरस्कार व प्रशंसा दोनों मिलते रहे और मेरा उत्साह भी बड़ता गया।मेरी पहली कहानी 'तोहफा' राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हुई।मैन हर पल,हर घड़ी ईश्वर का धन्यवाद किया।बिना उसकी के कृपा के हम कुछ हासिल नहीं कर सकते हैं।इस प्रकार ये तोहफा मेरे लिए अनमोल बन गया।क्योंकि इस तोहफे ने ही मेरा लेखन से परिचय कराया और मुझे लेखिका के रूप में अपनी एक पहचान दी।

सच सूरत शहर ने ही मेरे पंखों को उड़ान दी और मुझे अवसर दिया लेखन के अताह आकाश में उड़ने का।ये शहर हमेशा मेरे यादों में रहेगा।

#मेरेशहरसेजुड़ीमेरीयादें

कमलेश आहूजा

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