हाँ, मेरे आने की ख़बर से कोई ख़ुश नहीं -जानती हूँ मैं #Thursday Poetry

हाँ, मेरे आने की ख़बर से कोई ख़ुश नहीं -जानती हूँ मैं #Thursday Poetry
‘लड़की हुई है’ जब दादी ने उदास मन से सब को ख़बर सुनाई तो नन्ही सी जान भी उस उदासी से बेख़बर न रह पाई। पहचान गई वो सबके चेहरों की रंगत और साथ ही उन सब के मन के राज़। पर एक बात जो उसे परेशान किए जा रही थी वो थी उसकी माँ की फीकी सी मुस्कान और उस मुस्कान के पीछे छुपे ढेरों अनकहे जज़्बात। 
वो छोटी सी जान बहुत कुछ कहना चाहती है अपनी माँ से। एक छोटी सी कोशिश उसकी भावनाओं को व्यक्त करती हुई इस कविता के माध्यम से- 
हाँ, मेरे आने की ख़बर से कोई ख़ुश नहीं -जानती हूँ मैं, 
 पर माँ, तुम इतनी उदास सी क्यों हो?
तुम तो कहती थी मैं जान हूँ तुम्हारी,
फिर मुझे गोद में लिए तुम परेशान सी क्यों हो? 
बोलो न माँ मैं आज तुम्हारे दिल की हर बात सुनना चाहती हूँ,
और तुम्हारे इस घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूँ।
 
सब के मन में क्या है शायद मुझे पता है,
पर क्या तुमने अपने दिल की बात किसी को बताई?
कोशिश तो करके देखो , शायद कोई समझ जाए,
और हम जीत जाएँ उम्मीद और न उम्मीद की यह लड़ाई।
यूँ निराश होकर तो न बैठो,
 यह तो तुम्हारे मेरे हक़ की लड़ाई है,
एक बार तो खुद को तैयार करो मेरे लिए,
देखो मैंने तुमसे ही सारी उम्मीद लगाई है।
जानती हो-
मैं भी यह हसीन दुनिया देखना चाहती हूँ,
खुद को तुम्हारे प्यार के आँचल में पनपता महसूस करना चाहती हूँ।
दिल में न बैठा सको अभी तो न सही,
फ़िलहाल तो तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूँ। 
शामिल तो करो तुम मुझे अपनी दुनिया में,
दिलों में जगह मैं खुद ही बना लूँगी,
तुम बस अपने दिल के दरवाज़े खुले रखना,
चुपके से तुम सब को मैं अपना बना लूँगी।
मैं भी अपने प्यार की ताक़त आज़माना चाहती हूँ,
तुम्हारे इस खूबसूरत घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूँ।
वैसे जानती हूँ मैं, तुम मुझसे कितना प्यार करती हो,
पर शायद किसी बात से डरी डरी सी भी रहती हो,
इस बेरहम दुनिया की गुस्तखियों को,
तुम न चाहते हुए भी सहती रहती हो। 
यक़ीन रखो मेरा, मैं भी इस लड़ाई मैं तुम्हारा साथ देना चाहती हूँ।
इसीलिए तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूँ। 
देखो आज तो तुम्हें लड़ना होगा मेरी ख़ातिर,
फ़िर कल मैं तुम्हारा सहारा बनूँगी।
देख लेना नाज़ करोगी मुझ पर,
जब मैं दुनिया जीतने की क़ाबिलियत रखूँगी।
अभी तो अपने लिए तुम्हारा विश्वास ही चाहती हूँ,
और बस तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूँ।
पता है मुझे तुम भी मुझसे ख़ूब बतियाना चाहती हो,
सब से छुप छुप कर अपना दर्द मुझे सुनाना चाहती हो।
वादा है मेरा तुमसे, मैं तुम्हारे हर दर्द की दवा बनूँगी,
आख़िर मैं भी तुम्हारी बेपनाह मोहब्बत का क़र्ज़ चुकाना चाहती हूँ। 
और तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूँ।
पता है तुम्हें , मैंने एक हसीन ख़्वाब देखा है?
सपने में ख़ुद को और तुम्हें खुश बेहिसाब देखा है,
दुनिया की परवाह न कर, तुम मुझ पर नाज़ करती हो,
हर घड़ी, हर पल तुम अपना सब कुछ मुझ पर न्योछावर करती हो।
हाँ तुम्हारे साथ इस ख़्वाब को हक़ीक़त बनते देखना चाहती हूँ,
तभी तो तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूँ।
याद रखना आज अगर तुम कमजोर पड़ गई,
तो फिर कभी आवाज़ न उठा पाओगी,
दबते हुए को ही दबाती है दुनिया,
खुद पर यक़ीन रखो, देखना तुम यह अवश्य ही कर पाओगी। 
फिर मैं भी तो हूँ तुम्हारे साथ, देखो तुम किसी से मत डरना।
मैं न्याय अन्याय की इस लड़ाई में तुम्हें विजयी देखना चाहती हूँ।
तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूँ।
लो आज वादा करो मुझसे, 
मुझे और ख़ुद को हारने नहीं दोगी,
वो लाल स्वेटर और हरे मोज़े, जो मेरे लिए बड़े प्यार से बुने हैं तुमने,
अपने हाथों से ही मुझे पहनाओगी।
मैं भी प्यार के उन धागों की गर्माहट महसूस करना चाहती हूँ,
तुम्हारे घर में एक छोटा सा कोना चाहती हूँ। 
   - नविता भाटिया








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