तू अगर उस दिन ये न करता तो...

तू अगर उस दिन ये न करता तो...

आकांक्षा बहुत खुश थी कि उसको बारह साल कंपनी में हो गए थे बतौर क्वालिटी इंजीनियर आईटी विभाग में काम करते हुए। आकांक्षा पूरी मेहनत से अपना एक - २ प्रोजेक्ट पूरा करती थी और उसका काम लोगों को पसंद भी आता था पर कभी आकांक्षा से गलती होतो वो इसको बुरा न मानकर सकारात्मक तरीके से लेके सीखती थी। पर उसे समझ नहीं आता था कि पीठ पीछे बुराई करने वाले और किसी की मुँह पर झूठी तरीफ से उपर कैसे उठ जाते थे। बॉस को समझ नहीं आता क्या कि कौन झूठी तारीफ कर रहा है और कौन सच बोल रहा है या फिर सारे बॉस झूठी तारीफ के भूखे होते हैं।


कभी कभी उसके चेहरे पर उदासी आ जाती थी जब किसी और की प्रमोशन देखती इसलिए नहीं की उसकी प्रमोशन हुई बल्कि इसलिए की उसके काम में क्या कमी रही जो कभी ऊपर उठ नहीं पाई। पिछले पांच सालों से एक ही पद पर काम करते करते आकांक्षा का उत्साह कम होने लगा था। उसकी सकारात्मक शक्ति नकारात्मकता की ओर बढ़ने लगी थी। वो कितनी भी मेहनत करती उसकी मेहनत कभी पूरी तरह से सफल नहीं होती थी। हर साल किसी और का पद बढ़ जाता था। इसका कारण भी आकांक्षा समझती थी कि उसे किसी की झूठी तारीफ करना पसंद नहीं था और न ही बनावटी बातें करना। उसे लगता था जो लोग बॉस की झूठी तारीफ करते हैं वो लोग दुसरे को भी नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे।

आकांक्षा सोचती क्या झूठी तारीफ करना जरूरी है प्रमोशन पाने के लिए मेहनत का कोई मोल नहीं क्या। आकांक्षा कुछ समझती इससे पहले ही लोगों की बुराई का असर आकांक्षा की नौकरी पर भी पड़ा। उन धूर्त और घटिया कर्मचारियों ने भोली भाली आकांक्षा को कंपनी से निकलवा दिया।

आकांक्षा के साथ इतना बड़ा धोखा हुआ कि आकांक्षा अपनी ही आँखों के सामने आत्मविश्वास की मौत होते देख सकती थी। जहाँ आकांक्षा आत्मनिर्भर थी वहीँ उसका आत्मविश्वास बुरी तरीके से टूट चूका था नौकरी जाने से और लौकडाउन की वजह से दोबारा नौकरी मिलना मुश्किल हो गया। आकांक्षा दिन-बदिन सूखती जा रही थी। सारी उम्मीदें खत्म सी हो गई थी।

आज एक साल से ज्यादा हो गया था जब आकांक्षा अपनी आँखों के सामने खुद को आत्मनिर्भर न पाके उसके आत्मविश्वास की मौत होते देखती थी। उसे रह रह के अपने दोस्तों की बात याद आती थी कि वो कॉर्पोरेट की दुनिया में काम करने लायक नहीं है। उसे रह-रहकर विकास जो उसका सहकर्मचारी था बात याद आ रही थी जब उसने कहा था "तू कभी कल्पना भी नहीं कर सकती इतनी ऊपर उठने की आज देख मेरी तस्वीर कंपनी की मागज़ीने में छपी है, मैं बहुत ऊपर चला गया।" आकांक्षा मायूस हो गई थी और उसकी आँखों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी जब आज लोग उसे बंधाई दे रहे थे उसकी कामयाबी की।

विकास की इस बात से आकांक्षा की सकारात्मक शक्ति ने उसकी सहायता की और उसका लेख दुनिया के सबसे बड़े अखबार में दैनिक जागरण में उसकी तस्वीर के साथ छपा था। पुरे देश से उसके पास बँधाइयाँ आ रही थी और उसके बाद उसके लेख कई पत्रिकाओं, अख़बारों में छप चुके थे और आकांक्षा बहुत बड़ी लेखक बन चुकी थी और आज उसकी किताब का पहला पेमेंट आया था जो विकास जैसे हज़ारों लोगों की तनख्वाह से कही अधिक था।  उसने विकास और उसी जैसे उसके कर्मचारियों को जो सीमा का मज़ाक उड़ाते थे को फ़ोन पर वसपप करा अपना दैनिक जागरण वाला लेख तस्वीर के साथ और साथ साथ अपनी पब्लिश्ड हुई किताब भी और लिखा

"विकास हम जो देखना चाहें हमारी ऑंखें वही हमें दिखाती हैं चाहे यह ऑंखें मौत भी दिखा सकती हैं और चाहे तो ऊपर उठता हुआ भी दिखा सकती हैं। जब तूने उस दिन मैगज़ीन में अपनी तस्वीर दिखा कर मेरा आत्मविश्वास तोड़ना चाहा पर मेरी शक्ति ने मुझे उससे प्रेरणा लेकर यह दिन दिखाया और देख आज मैं दुनिया के सबसे बड़े अखबार में हूँ और तू बस मैगज़ीन तक सिमित रह गया और हाँ मेरी किताब तो शायद ही तू पढ़े पर इतना बता देती हूँ की तेरे जैसे लोगों की सोच सिर्फ घटिया तरीके से किसी की झूठी तारीफ कर के आगे बढ़ने में है पर मेहनत का अपना मोल है जो आज मैंने जान लिया है और तू भी जान ले तो बढ़िया होगा तेरे लिए नहीं तो बैठे रह तलवे चाटने के लिए जो ज़िन्दगी भर तू करता आया है। तू अगर उस दिन ये न करता तो मैं एक सफल लेखक कभी नहीं बन पाती। आगे कभी किसीके आत्मविश्वास को चोट मत पहुंचाना क्यूंकि ये आँखें अपने आत्मविश्वास की मौत भी देख सकती हैं।"

आज आकांक्षा की आँखों में उसका आत्मविश्वास मौत के मुँह से बाहर निकल आया था और ये आकांक्षा की सकारात्मक सोच ने उसे बचाया था।

अपने विचार ज़रूर सांझा करिएगा मेरी इस कहानी पर।

मेरा लेख पढ़ने के लिए सभी पाठकों को दिल से शुक्रिया❤️

धन्यवाद !

स्वरचित हैप्पी{वाणी}राजपूत????

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