तुम्हारी आंखों में पल रहे मेरे सपने

तुम्हारी आंखों में पल रहे मेरे सपने

मंजूकी दोनों बेटियों का आज 12वीं बोर्ड की परीक्षा का  निकला था। दोनों ही बेटियों ने 90% से ऊपर नंबर लिए थे। उनकी सफलता देख मंजू की तो मानो बरसो की तपस्या सफल हो गई थी। आज उसे अपनी बेटियां पर गर्व हो रहा था । इसी खुशी में उसनेे सारे मोहल्ले में मिठाई बंटवाई।

इसी खुशी में उसके मायके वालों ने उसे और उसकी बेटियों को दावत पर बुलाया था
जब वह अपनी बेटियों को लेकर वहां पहुंची तो सभी ने मंजू की दोनों बेटियों को खूब आशीष दी।
थोड़ी देर की बातचीत के बाद मंजू की मां बोली
"बेटा अब तेरी दोनों बेटियों ने 12वीं कर ली है। अब उनके लिए कोई अच्छा सा रिश्ता देखना शुरू कर दे। पता है ना हमारी बिरादरी में ज्यादा पढ़े-लिखे लड़के तो मिलते नहीं।  अब तो तू इनकी शादी की सोच।‌वैसे भी बिन बाप की बच्चियों का रिश्ता होना कितना मुश्किल है यह तुझे भी पता है।"
अपनी मां की यह बात सुन मंजू के मानो बरसों पुराने जख्म फिर हरे हो गए थे। उसके चेहरे पर एकदम से गुस्सा आ गया और वह बोली
"मां मुझे अपने बेटियों की शादी की अभी कोई चिंता नहीं है। दोनों पढ़ लिख कर, जब तक अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती, मैं उनकी शादी नहीं करूंगी!"
"पागल हो गई है क्या तू! पता भी है, क्या कह रही है। एक तो बिन बाप की बच्चियां ! ऊपर से उम्र हो गई तो कोई रिश्ता भी नहीं मिलेगा। क्या सारी उमर अपने पास रखेगी इनको!"

"मां मेरी बेटियां बोझ नहीं। जो मैं इन्हें किसी भी खूंटे से बांध दूं। आप लोगों ने तो मेरी जल्दी शादी की थी ना! क्या सुख मिला मुझे! शादी के 5 साल बाद ही पति चल बसा। ससुराल वालों ने नाता तोड़ लिया और बुरा मत मानना! आप लोगों ने भी तो इसे भाग्य का लेख समझ, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया था। आपको भी डर था कि मुझे कुछ सहारा लगाओगी तो बेटे बुरा मान जाएंगे और आप लोगों का बुढ़ापा खराब हो जाएगा। तो मां अब! तो अब भी हमें हमारे हाल पर छोड़ दो!"कह मंजू वहां से आ गई।
आज नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी। वह क्या कम होशियार थी पढ़ाई लिखाई में। अपने अध्यापकों की कितनी चहेती थी वह। सभी शिक्षकों को पूरी उम्मीद थी उससे कि आगे जाकर कुछ ना कुछ जरूर बनेंगी वह। दसवीं में अपने स्कूल में सबसे ज्यादा अंक प्राप्त किए थे उसने। लेकिन माता-पिता ने यह कहते हुए कि उच्च विद्यालय दूर है, उसे आगे पढ़ने की अनुमति नहीं दी। उसकी भावनाओं की परवाह किए बिना, उसका रिश्ता उससे उम्र में 15 साल बडे  व्यक्ति से कर दिया। कितना रोई थी वह । मां को कितना समझाया था लेकिन किसी ने उसकी एक ना सुनी। सबका एक ही कहना था। खाता पीता घर है, किसी चीज की कमी ना होगी। आदमी औरत में 10 15 साल का अंतर मामूली बात है। उसकी शादी कर दी।
उसने भी इसे अपनी नियति मान लिया और ससुराल वालों की सेवा में अपना जीवन लगा दिया । लेकिन ससुराल वालों के लिए वह घर का कामकाज करने वाली एक दासी और पति के लिए  केवल उसके मनोरंजन का साधन मात्र थी।
हरदम हंसने बोलने वाली मंजू के चेहरे से मुस्कान तो मानो गायब हो गई थी। उसके दिल की सुनने वाला कोई ना था वहां। जब मां-बाप ने ही ना सुनी तो यहां किससे अपने दिल की कहती। 1 साल बाद ही वह जुड़वां बेटियों की मां बन गई। ससुराल वालो ने बेटियां पैदा करने पर उसका जीना और मुहाल कर दिया था। पति ने तो कभी बच्चियों को गोद में उठाना तो दूर , नजर भर देखा तक ना था। अपनी बेटियों के लिए उसका ऐसा रवैया देख मंजू को बहुत दुख होता था।

दुखों की तो अभी शुरुआत हुई थी। मंजू का पति अक्सर बीमार रहता था। दिखाने पर पता चला। उसे टी बी हो गई था। अपने खाने पीने के शौक के कारण दवाइयों ने भी असर करना बंद कर दिया और 1 साल के भीतर वह चल बसा।
मंजू की शादी को अभी 5 साल ही हुए थे। दोनों लड़कियां 3 साल की थी। ससुराल वालों ने उसे मनहूस करार देते हुए वहां रखने की एक शर्त रखी कि अगर मंजू अपने शराबी देवर से शादी करने के लिए हां करेगी तो वह लोग उसे अपना लेंगे और उसे जायदाद में भी हिस्सा मिल जाएगा वरना उसके लिए इस घर में कोई जगह नहीं।
मंजू की मां व भाइयों ने उस पर इस बात को मानने का बहुत दबाव डाला। उसकी मां ने समझाते हुए उसे कहा था "बेटी बिना पति की औरत को समाज जीने नहीं देगा और फिर दो दो बेटियां हैं, कहां लेकर जाएगी इन्हें। हां कर दे इसी में तेरा व तेरी बेटियों का भला है। मैं तेरी मां हूं, तेरा बुरा नहीं चाहूंगी।"
"मां मेरे साथ जितना बुरा होना था हो चुका लेकिन समाज के डर से मैं शराबी से शादी कर लूं, जिसे दूसरे लोगों ने अपनी बेटी देने से मना कर दिया, उसके लिए मैं बलि चढ़ी जाऊं। मैं कोई कठपुतली नहीं। जिसे जैसा चाहो वैसा नचाओ। मां इन 5 सालों में तेरी बेटी को गमों के थपेड़ों ने बहुत कुछ सिखा दिया है और अब वह पहले वाली कमजोर मंजू नहीं बल्कि दो बेटियों की मां है और मां कभी कमजोर नहीं होती। मेरे साथ जो होना था, हो चुका लेकिन मैं अपने बेटियों का भविष्य अपने बलबूते पर संवार कर दिखाऊंगी।"
अब मंजू ने निश्चय कर लिया था कि वह समाज की चिंता नहीं करेगी । वह आत्मनिर्भर बनेंगी और अपनी बेटियों को भी आत्मनिर्भर बनाएगी। अपने फैसले, वह खुद लेगी।

अनुकंपा के आधार पर उसे अपने पति के स्थान पर नौकरी मिल गई। बेटियों को अकेले संभाल पाना संभव ना था और वह भी इतनी कम उम्र में। लेकिन उसने अपनी इच्छाशक्ति के बल पर यह कर दिखाया।
बेटियों को हमेशा आगे बढ़ने का मौका दिया। उनकी पढ़ाई के साथ साथ उसने अपनी बेटियों को अपने हर छोटे बड़े फैसले में शामिल किया। जिसे आगे जाकर उनमें आत्मविश्वास बने और अपने निर्णय खुद ले सके।

यह सब सोचते सोचते उसकी आंखों से आंसू निकल आए। वह पानी पीने के लिए वह उठी ही थी कि दोनों बेटियों को अपने सामने खड़ा देख आंसू छुपा, मुस्कुराते हुए पूछा "तुम दोनों सोई नहीं अभी तक!"
"आपको परेशान देख क्या हम सो सकते हैं। आप हमारा चेहरा देखकर सब कुछ समझ जाती हो तो क्या हम आपकी आंखों में छुपे आंसुओं को नहीं पढ़ सकते!"
"हां हां तुम दोनों तो मेरी दादी अम्मा बन गई हो!"
"दादी अम्मा नहीं मां, आपकी सहेलियां हैं हम। हमारे कारण ही आपने अपना पूरा जीवन अकेले काट दिया। अपने सब सपनों की बलि दे दी आपने।"
"अरे पगली हो तुम दोनों! अकेली कहां मैं! तुम दोनों हो ना! तुम्हारे सहारे ही तो मैं जी रही हूं। अपने सपनों की बलि नहीं दी मैंने। मेरे सपने तुम दोनों की आंखों में पल रहे हैं और तुम‌ दोनों को ही उन्हें पूरा करना है। करोगी ना!"
"हां मां हां! तुम्हारी बेटियां तुम्हारा हर सपना पूरा करेंगी और जिस समाज ने आपको और हमें अपनाने से इनकार किया था। वहीं आप की परवरिश पर एक दिन गर्व करेगा। वादा है आपकी बेटियों का!"

दोस्तों कैसी लगी आपको मेरी यह रचना, पढ़कर इस विषय में अपने अमूल्य विचार जरूर दें।
आपकी सखी, सरोज ✍️

डि

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