वसीयत

वसीयत

प्रतीक आज फिर लड़खड़ाते हुए दरवाजे पर खड़ा था और जोर-जोर से दरवाजा पीट रहा था। सुप्रिया भागते हुए आई और दरवाजा खोल दिया। सुप्रिया को देखकर प्रतीक भड़क के बोला-"इतनी देर से दरवाजे पर खड़ा हूं। कान में तेल उडे़ल के रखा है क्या? जो सुनाई नहीं देता है। इतना टाइम लगता दरवाजा खोलने में। किसी को क्या मतलब है सब मुफ्त की रोटी तोड़ रहे हैं।"

सुप्रिया ने कुछ नहीं बोला और चुपचाप दरवाजा बंद करने लगी। 
प्रतीक को चिल्लाता देख उसके मम्मी-पापा भी अपने कमरे से निकल आए। उन्होंने प्रतीक से कहा-"प्रतीक यह कोई टाइम है।11बज रहे हैं। बच्चे भी पापा-पापा याद करते-करते सो जाते हैं और सुप्रिया देर रात सोती है,सुबह जल्दी उठती है। बेचारी बीमार पड़ जाएगी।थोड़ा जल्दी आया करो।अपने मां-बाप की बात काटता हुआ प्रतीक बोला-"बस,चुप रहिए।लैक्चर मत छाड़िए। बड़ी चिंता हो रही है अपनी बहू की।कभी अपनी बेटे की चिंता की है?"और यह कहकर पैर पटकते हुए अपने कमरे में चला गया।


 पिता महेंद्र सिंह सेल्स टैक्स में ऑफिसर थे।उनको पेंशन मिलती थी। माता-पिता महेंद्र और आशा अपने बेटे के इस व्यवहार और रहन-सहन से बहुत चिंतित रहते थे कि उनकी जाने के बाद भविष्य में उनकी पोते-पोती और बहू का क्या होगा? अगर ऐसे ही चलता रहा तो बेटे की गृहस्थी कैसे चलेगी?वह अपने बेटे को समझाए तो कैसे समझाए?कोई दूध पीता बच्चा तो है नहीं ।38 साल का जवान हो चुका है।दो बच्चों का बाप है।बच्चों पर भी क्या असर पड़ेगा।

यह सोचकर दोनों बहुत परेशान रहते थे।जो बहु पूरे घर में चहकती रहती थी वह बहू अब उदास रहने लगी थी । बहू को कितने चाव से लाए थे बेटी बनाकर रखेंगे। उन्होंने अपनी तरफ से उसे कोई कमी नहीं छोड़ी पर बेटा इतना नालायक निकला। जिस कारण बहु एकदम बेचारी और गुमसुम रहने लगी थी। वह सब जानती थी, सुशील संस्कारी थी,उसने अपना दर्द सीने में दबा लिया था।


अगले दिन सुप्रिया प्रतीक को नाश्ते में दही दिया।दही देखकर प्रतीक फट पड़ा और बोला-"शादी को 10 साल हो गए हैं और तुम्हें यह भी नहीं पता की नाश्ते में मैं दही नहीं खाता। तुम्हें हर बार बताना पड़ेगा कि मैं क्या खाता हूं? क्या नहीं खाता? थोड़ा दिमाग भी लगाया करो।"तभी सास सरिता आई और प्रतीक से बोलीं-"ये क्या तरीका है बात करने का।ढंग से बोल दो या जो नहीं खाना वह निकाल दो एक तरफ।" यह सुनकर प्रतीक ने खाना नाश्ता छोड़ दिया और ऑफिस चला गया।

घर के सभी लोग प्रतीक की व्यवहार से नाखुश थे। प्रतीक के माता-पिता,पत्नी बहन ने कई तरीके से समझाया पर उसका स्वभाव सुधरने की बजाय और बिगड़ता गया।


एक दिन पिता महेंद्र सिंह ने कड़ा निर्णय लेते हुए प्रतीक से कहा-"मैंने तुम्हें अपनी चल-अचल सम्पत्ति से बेदखल कर दिया है।मैंने तुम्हारी शादी किसी की बेटी का जीवन बरबाद करने के लिये नहीं की।वह तुम्हारी पत्नी है चुप रहती है तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसका कोई नहीं है।अरे! मैं बैठा हूँ,उसका ससुर कम पिता ज्यादा हूँ।मैं वह पिता नहीं हूँ जो अपने बेटे की गलती पर पर्दा डाले।अब तुम इस घर से जा सकते हो।"
 प्रतीक को आज पिताजी के कड़े निर्णय पर विश्वास नहीं हो रहा था।
धन्यवाद
©राधा गुप्ता 'वृन्दावनी'
अगर आपको मेरी यह लेख अच्छा लगा हो मुझे फालो कीजिए।

#MyFatherMyHero

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