वट सावित्री व्रत

वट सावित्री व्रत

वट सावित्री व्रत
हिंदू धर्म में महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए कई व्रत रखती हैं। ऐसे ही व्रतों में से एक है वट सावित्री व्रत। विवाहित महिलाएं इस दिन अपने सुहाग के दीर्घायु होने के लिए व्रत करती हैं। 
ज्येष्ठ मास की अमावस्या पर सुहागिन महिलाओं द्वारा वट सावित्री व्रत रखा जाता है। इस व्रत के प्रभाव से सौभाग्यवती महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती है। उनका सौभाग्य अखंड रहता है। 
हिंदू धर्म में महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए कई व्रत रखती हैं। ऐसे ही व्रतों में से एक है वट सावित्री व्रत। 
       22मई को वट सावित्री है लेकिन लॉकडाउन ने नवविवाहिताओं का उत्साह कम कर दिया है। घर से निकलना भी मुश्किल है। इसलिए इस बार वट सावित्री पूजा घर में ही की जाएगी।
  महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिणी भारतीय राज्यों में विवाहित महिलाएं उत्तर भारतीयों की तुलना में 15 दिन बाद समान रीति से वट सावित्री व्रत मानतीं हैं।
     पुराणों के अनुसार, वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु व महेश तीनों का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से मनोकामना पूरी होती है। भगवान बुद्ध को इसी वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। अतः वट वृक्ष को ज्ञान, निर्वाण व दीर्घायु का पूरक माना गया है।
         सावित्री को भारतीय संस्कृति में आदर्श नारीत्व व सौभाग्य पतिव्रता के लिए ऐतिहासिक चरित्र माना जाता है। वट वृक्ष का पूजन और सावित्री-सत्यवान की कथा का स्मरण करने के विधान के कारण ही यह व्रत वट सावित्री के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
              महिलाएँ व्रत-पूजन कर कथा के साथ-साथ वट वृक्ष के आसपास सूत के धागे को परिक्रमा के दौरान लपेटती हैं, जिसे रक्षा कहा जाता है। साथ ही पूजन के बाद अपने सास-ससुर के चरणस्पर्श करती हैं ।

"वट सावित्री व्रत कथा"

कहते हैं कि भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए अनेक वर्षों तक तप किया जिससे प्रसन्न हो देवी सावित्री ने प्रकट होकर उन्हें पुत्री का वरदान दिया जिसके फलस्वरूप राजा को पुत्री प्राप्त हुई और उस कन्या का नाम सावित्री ही रखा गया।
     सावित्री सभी गुणों से संपन्न कन्या थी ।एक बार उन्होंने पुत्री को स्वयं वर तलाशने भेजा ।सावित्री ने  साल्व देश के राजा द्युमत्सेनपुत्र सत्यवान को देखकर उन्हें पति के रूप में वरण किया।
   जब यह बात ऋषिराज नारद को ज्ञात हुई तो वे अश्वपति से जाकर कहने लगे- सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा है परन्तु वह अल्पायु है और एक वर्ष के बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी।
राजा ने अपनी पुत्री को समझाया की ऎसे अल्पायु व्यक्ति के साथ विवाह करना उचित नहीं है. इसलिये अन्य कोई वर चुन लो।
 सावित्री अपने पिता से कहती है कि मैं सत्यवान को ही वर रुप में स्वीकार कर चुकी हूँ। इस बात को सुन दोनों का विधि विधान के साथ पाणिग्रहण संस्कार किया गया और सावित्री अपने ससुराल पहुंचते ही सास-ससुर की सेवा में लग गई।
 नारद का वचन सावित्री को याद था। उसने जब जाना कि पति की मृत्यु का दिन नजदीक आ गया है तो वह भी सास-ससुर की आज्ञा से अपने पति के साथ जंगल में चलने के लिए तैयार हो गई़।
सत्यवान वन में पहुंचकर लकडी काटने के लिये वृ्क्ष पर चढ गया ।वृ्क्ष पर चढते ही सत्यवान के सिर में असहनीय पीडा होने लगी।वह वृक्ष से नीचे उतर गया।सावित्री अपना भविष्य समझ गई तथा अपनी गोद का सिरहाना बनाकर अपने पति को लिटा लिया। 
उसी समय दक्षिण दिशा से अत्यन्त प्रभावशाली यमराज को आते देखा।
धर्मराज सत्यवान के जीवन को जब लेकर चल दिए तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पडी। पहले तो यमराज ने उसे दैवीय-विधान समझाया परन्तु उसकी निष्ठा और पतिपरायणता देख कर उसे वर मांगने के लिये कहा।
       सावित्री बोली - मेरे सास-ससुर वनवासी तथा अंधे है उन्हें आप दिव्य ज्योति प्रदान करें. यमराज ने कहा ऎसा ही होगा और अब तुम लौट जाओ। यमराज की बात सुनकर उसने कहा - भगवान मुझे अपने पतिदेव के पीछे पीछे चलने में कोई परेशानी नहीं है। पति के पीछे चलना मेरा कर्तव्य है। यह सुनकर उन्होने फिर से उसे एक और वर मांगने के लिये कहा।सावित्री बोली-हमारे ससुर का राज्य छिन गया है, उसे वे पुन: प्राप्त कर सकें, साथ ही धर्मपरायण बने रहें। यमराज ने यह वर देकर कहा की अच्छा अब तुम लौट जाओ परंतु वह न मानी।
      यमराज ने कहा कि पति के प्राणों के अलावा जो भी मांगना है मांग लो और लौट जाओ इस बार सावित्री ने अपने को सत्यवान के सौ पुत्रों की माँ बनने का वरदान मांगा यमराज ने तथास्तु कहा और आगे चल दिये सावित्री फ़िर भी उनके पीछे पीछे चलती रही इस से यमराज नाराज हो जाते हैं।
      यमराज को क्रोधित होते देख सावित्री उन्हें नमन करते हुए उन्हें कहती है कि आपने मुझे सौ पुत्रों की मां बनने का आशीर्वाद तो दे दिया लेकिन बिना पति के मैं मां किस प्रकार से बन सकती हूं इसलिये आप अपने तीसरे वरदान को पूरा करने के लिये अपना वरदान पूरा करें।
    सावित्री की पतिव्रत धर्म की बात जानकर यमराज ने सत्यवान के प्राण को अपने पाश से मुक्त कर दिया सावित्री सत्यवान के प्राणों लेकर वट वृक्ष के नीचे पहुंची और सत्यवान जीवित होकर उठ बैठे दोनों हर्षित होकर अपनी राजधानी की ओर चल पडे वहां पहुंच कर उन्होने देखा की उनके माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है।
इस प्रकार सावित्री-सत्यवान लंबे समय तक राज्य सुख भोगते रहें। वट सावित्री व्रत करने और इस कथा को सुनने से  वैवाहिक जीवन या जीवन साथी की आयु पर किसी प्रकार का कोई संकट आया भी हो तो टल जाता है।

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