वीरांगना

 वीरांगना

घर में ही क्यूँ दुश्मन पाले लगता आस्तीन में नाग हैं पाले

रोज़ -रोज़ हम देख चुके हैं ...

कभी इधर कभी उधर  कभी दामिनी कभी निर्भया

क्यूँ पिए हम रोज़ ज़हर  अब हर नारी को हर लड़की को ...

बस तलवार उठना हैं

नज़र भी कोई उल्टी डाले पलट वार कर ज़ख़्मी उसे बनाना हैं ...

सोच अगर जब ना बदले तो रक्त ही उनका बदलना हैं ..

राम सिया के इस भूमि पर अब रावण नही बसाना है ...

हर गली हर घर को सुरक्षित यही तो हमने चाहा हैं

हमें बनाना हैं हर नारी के आत्मबल से वीरांगना उसे बनाना हैं ...

जुग जुग जिए ये देश हमारा हर वक्त रहे नाम तुम्हारा अब ना लगेगा कलंक कोई अब ना होगा कोई

चिरहरण हर दुस्साशन को चुन चुन कर दिवार में चुनवाना हैं

हर नारी को एक वीरांगना हमें बनाना हैं ...

बहुत जला लिए चौक पर दीये अब मशाल उठानी हैं ...

जिसने आँचल को छू भी लिया ...

वही उसे बस भस्म किया ....

वीरों के इस धरती को स्वर्ग हमें बनाना हैं ....

अमन चैन से रहे सभी यही संदेश तो सब तक पहुँचना हैं !!!!!!!!!

आपकी एक सखी

अल्पना ...

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