पुनर्विवाह पुरुषों की गौरवशाली परम्परा स्त्रियों का लांँछन क्यों

पुनर्विवाह पुरुषों की गौरवशाली परम्परा स्त्रियों का लांँछन क्यों

परम्पराएंँ, भारतीय सभ्यता और संस्कृति का एक अभिन्न अंग। जिसे बताते हुए हम गर्व से भर जाते हैं, जिसे हम स-सम्मान अपनी भावी पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं। कितना समृद्ध है ना हमारा भारत इन परंपराओं की पूंँजी से। विविध सभ्यता, विविध संस्कृति, विविध मान्यताएंँ और इन विविधताओं को सहेजे हुए हमारी परम्पराएंँ। सभ्यता के विकास से अब तक न जाने कितनी सभ्यताएंँ नष्ट हुई कितनी सभ्यताओं का विलय हुआ, लेकिन भारतीय सभ्यता अब तक अक्षुण्ण है इसका एक अहम कारण है हम भारतीयों का तटस्थ न बने रहकर लोचशील होना। हमने तमाम परिवर्तन के साथ अपनी परम्पराओं में आमूलचूल परिवर्तन किया, नए विचारों का समावेश किया, पुरानी कुंठाओं की बगावत की और ऐसे ही निस्पंदन की प्रक्रिया से गुजरते हुए हम विश्व के सबसे श्रेष्ठ परम्पराओं और सभ्यता के स्वामी हुए।

लेकिन इतने विकास और इतने filtration के बाद भी जब हम समाज में महिलाओं की स्थिति देखते हैं, तो नजर शर्म से झुक जाती है। हमारा देश सीता, सावित्री, अहिल्या जैसी महान स्त्रियों के नाम से हमेशा यश पाता है। हर घर चाहता है बहु रूप में सीता का गृह प्रवेश हो, हर आंँगन चाहता है वहाँ सावित्री खेले। लेकिन क्या हम अपनी बेटियों को वह सम्मान दे पाएं हैं जो वास्तव में सीता के बलिदानों के बाद उनकी बेटियों को दिया जाना चाहिये? इन सवालों का जवाब हमें औरों से नहीं खुद अपने आप से माँगना है। अपने आस-पास नज़र घुमायेंगे तो रूह में थोड़ी सिहरन तो निश्चित ही होने लगेगी। 

यूंँ तो तमाम आंदोलनों और सुधारों के बाद आज भी समाज भिन्न-भिन्न कुंठाओं के मोहपाश में जकड़ा है। सती प्रथा मिट गई, महिलाओं को शिक्षा और रोजगार का अधिकार मिल गया लेकिन पितृ सत्ता के दंभ की आग आज भी स्त्री के स्वाभिमान को झुलसा रही है। इतनी चर्चा के बावजूद हम कन्यादान जैसे घृणित प्रथा तक के विरोध में एकमात नहीं हुए हैं, मंदिर की दहलीज़ों के बाहर आज भी स्त्रियांँ अपने अधिकार की ज़ंग लड़ रही हैं। पुनर्विवाह की परम्परा पर अब भी पुरुषों का एकाधिकार है, इस गली में झांँकना स्त्रियों केलिए सर्वता हेय कृत्य है। ये कौन सी परम्परा है जो पुरुषों को विविध परिस्थितियों में पुनर्विवाह की आज्ञा गौरव सहित देता है तो एक स्त्री जैसे ही किसी पुरुष के साथ सात फेरे ले लेती है, वह आजीवन उसी के नाम के साथ जीने को बिना सहमति सहमत मान ली जाती है। फिर चाहे वह विधवा हो जाय या फिर वैवाहिक संबंध में यातनाओं का शिकार होती रहे या फिर तलाकशुदा हो। एक पुरुष अधेड़ उम्र में भी पत्नी की मृत्यु में पश्चात विवाह के योग्य बना रहता है, दस संतान के बाद भी मात्र पुत्र प्राप्ति केलिए दूसरी शादी के लिए समाज उसका पक्ष रखती है, लेकिन स्त्री आज इस इक्कीसवीं सदी में भी पुनर्विवाह की योग्यता पाने में नाकाम करार की गई है।  

जब समाज का आँकलन करती हूँ तो लगता है महिला की हालत लगभग हर समाज में एक सी है। कहीं थोड़ा कम कही थोड़ी अधिक लेकिन मानसिक रूढ़ता हर जगह स्त्री जीवन की उन्मुक्तता को अवरोधित करती है। एक स्त्री को जन्म से ही संरक्षण का पाठ रटाया जाता है। जन्म के साथ पिता और भाई उसके संरक्षक बन जाते हैं तो कन्यादान कर पिता अपना यह भार भावी पति के सुपुर्द कर देता है। लेकिन कालचक्र पति छीन ले फिर तो मानो अभिशापों का पहाड़ टूट जाता है। कभी मायके में लक्ष्मी और ससुराल में अन्नपूर्णा कहलाने वाली विधवा अब हर नजर से उपेक्षा पाती है। घर और समाज के प्रत्येक शुभ रस्मों से उसे दूर कर दिया जाता है, जिसके सोलह श्रृंगार से महालक्ष्मी का ऐश्वर्य झलकता था,उसे साज-श्रृंगार की हर चाह का दम घोंटना होता है, कई बार तो मैने यह भी देखा है कि जिन्हें कभी माँसाहार से विशेष लगाव था, पति के देहावसान के बाद उन्हें अपने प्रिय खान-पान को भी त्यागना होता है। अभिषापित जीवन ही उनका विकल्प होता है। और यदि इसको नकार कर वह किसी के संग जीवन के रंग सहेजने का सपना देखे तो समाज के सवाल उन्हें निरुत्तर कर देता है। दूसरी ओर यदि पति या ससुराल के अत्याचार के बाद कोई महिला तलाक लेकर अकेले जीवन-यापन करती है तो समाज को इसमें भी जाने क्यों आपत्ति होती है? स्त्री के एकल स्तित्व से समाज क्यों इतना भयभीत होता है कि तमाम यातना और प्रताड़ना के बाद भी उसे संयम और धैर्य का पाठ सिखा कर सहते हुये मृत्यु वरण करने की सीख देता है? घर चाहे पति का हो या पिता का, अकेली औरत को आसरा देने का इच्छुक कोई नहीं होता। इन सबके बीच पति और पिता से पृथक महिला अपने आसरे को भी मोहताज हो जाती है। एक घर पिता का था, एक उसके पूर्व पति का था.... लेकिन उसका घर अब कहाँ है? बस हर ओर सामाजिक और धार्मिक बंधनों की बेड़ियांँ डालकर उसे काबू में रखने की कोशिश की जती है। 

7 दिसंबर 1856 को ईश्वर चंद विद्यासागर ने तमाम भ्रांँतियों को धता बताते हुए, तमाम जन आक्रोश का सामना करते हुए 10 वर्षीय बाल विधवा का पुनर्विवाह कराया। लेकिन वह क्रांतिकारी पहल अब तक मात्र पन्नों में ही दर्ज है, हमारी मानसिकता पर उसका प्रभाव बहुत कम हुआ। हम इतने अधिक पुरुषवादी है चुके हैं समाज में लगे शोषण के इस जंग को हटाने का प्रयास भी फिजूल लगता है। तभी तो पुनर्विवाह से संबंधित सरकारी योजनाएंँ भी धूल चाटती रह जाती है। किसी राज्य में साल 2007 में विधवा पुनर्विवाह योजना लागू की गई, लेकिन 7 वर्षों में मात्र एक ही महिला को लाभ मिल सका। कारण मंशा में कोताही के सिवा और क्या हो सकता है। योजनाओं का प्रचार प्रसार न होना और नियमों को इतना जटिल बना देना की उम्मीदें उससे टकरा कर ही भ्रमित हो जाए, यह समाज और व्यवस्था का इस लाभ से महिलाओं को दूर रखने की साजिश ही कही जाएगी। ज्यादातर पुनर्विवाह योजनाओं में मात्र विधवाओं को ही शामिल किया जाता है, जबकि उसकी उतनी ही आवश्यकता परित्यक्ताओं को भी है। क्या बेहतर न हो कि पुनर्विवाह का लाभ प्रत्येक स्वप्निल आंँखों को दिया जाय। 

हमारे देश का सामाजिक एवं आर्थिक विकास पुरुष एवं महिला दोनों ही आबादी पर बराबर तरीके से निर्भर करता है। जब महिला एवं पुरुष दोनों अपने-अपने जीवन के चरणों में आगे बढ़ेंगे, देश के विभिन्न कार्यों में भागीदार होंगे, तभी देश का विकास होगा। केवल पुरुषों के प्रबल होने से अथवा महिलाओं के दबे कुचले होने से समाज कभी भी स्वस्थ नहीं हो सकता है। प्रभुत्व का दीमक उस समाज को पूर्णतः चाट जाएगा। ऐसे में विकास कितना संभव है? 

हाँ बीती सदी से अब तक एक महत्वपूर्ण परिवर्तन अवश्य हुआ है, आज की महिला अपने इक्षाओं और सपनों को लेकर ज्यादा संवेदनशील हैं। अपने हक़ की आवाज उठाना उन्होंने सीख लिया है। अपनी क्षमता और कुशलता का परिचय देते हुये महिलायें खुद को आर्थिक रूप से सबल कर रही हैं। इसका लाभ समाज की एकल महिलाओं को भी मिला है। अपनी इस अवस्था में हमारी बहनें किसी पर पूरी तरह आश्रित होकर असहाय बनने की विकट अवस्था से निकल कर अपने भविष्य की निर्माता के रोल में सम्मान अर्जित कर पाने में सफल हो रही हैं। 

जहाँ तक विधवा और तलाकशुदा महिलाओ के पुनर्विवाह की बात है, तो इतना तो अवश्य हुआ है कि इस विषय पर चर्चा होनी शुरू हुयी है। लोग चर्चे में इस बात से सहमत होते हैं कि महिलाओं को जीवन में एक अवसर पाने का अधिकार अवश्य है। लेकिन वास्तव में एकल महिलाओं के पुनर्विवाह की राह इतनी भी आसान नहीं। देश में विधवाओं के मुकाबले विधुर पुरुषों की संख्या केवल एक तिहाई है। आंँकड़े गवाह हैं कि केवल नौ प्रतिशत विधवाएंँ ही दोबारा विवाह कर पाती हैं। इसका कारण अंधी सामाजिक परंपरा है, जो पत्नी की मृत्यु के बाद पुरुष को दूसरे विवाह की अनुमति तो सहज दे देती है, किंतु विधवा को अकेले जीने को विवश करती है। परिवार की संपत्ति बाहर जाने का डर  विधवा-विवाह के मार्ग में एक बड़ी अड़चन है। लड़की कितनी भी योज्ञ, शिक्षित और सक्षम हो यदि एक बार उसपर विवाह का लेबल लग गया तो फिर विधवा होने या तलाक़ होने के बाद उसके पुनर्विवाह की राह कई अर्चनो से युक्त होती है। अभी भी कोई परिवार अपने घर पहले से विवाहित स्त्री की डोली नहीं लाना चाहता। कुछ विकासोन्मुखी लोग एक ढ़र्रा तय करके स्त्रियों को पुनर्विवाह की राह दिखाने का प्रयास तो कर रहे हैं, लेकिन पुनर्विवाह केलिए ज्यादातर विधुर और अधेड़ उम्र के व्यक्ति ही अपनी मजबूरी में आगे आते हैं। समाज और परम्परा के दबाव में महिला स्वयं भी अपने लिये निर्णय लेने में सहमती हैं। जब भी कोई एकल महिला पुनर्विवाह का निर्णय लेती है, समाज के चौधरियों की चौपाल शुरू हो जाती है। अपनी बातों से उस स्त्री का चरित्र हनन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। यह यातना उस स्त्री के साथ उसके संबंधी और शुभचिंतकों को भी झेलना होता है। हम पहले से ही तय किए बैठे हैं कि पितृसत्ता के फलां सलाख से गर्दन निकालने वाली महिला का चरित्र फलां होगा और फलना सलाख से गर्दन निकालने वाली महिला का चरित्र फलना।

बावजूद इसके अच्छी खबर यह है कि कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओ ने इस ओर विशेष ध्यान देकर समाज को इस विकृत मानसिकता ने निकालने की पहल की है। और उन्हें धीरे-धीरे ही सही, लेकिन सफलता भी मिल रही है। लेकिन व्यापक परिवर्तन केलिये पूरे समाज को निष्ठावान होकर काम करना होगा। हर व्यक्ति को अपने लिये निर्णय लेने का और मनोकूल जीवन के चयन का अधिकार है। हमे कोई हक़ नहीं है कि हम उन्हें दिग्भ्रमित करे या कुँये के मेंढक की तरह अन्धकूप में ही आनंद खोजने को विवश करें। सामाजिक संस्थाओ के सहयोग से स्त्री शिक्षा को सुनिश्चित करके उन्हें स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर बनाना हमारा उद्येश्य बन जाये तो सम्मानित कल का निर्माण कर सकते हैं । सभी को ऐसे कदम उठाने होंगे, जिससे महिलाओं को बराबरी का हक मिले, चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र हो, या नौकरियों में या समाज और घरों में हो। इस प्रकार उनमें प्राकृतिक रूप से आत्मसम्मान पनपेगा और वह जीवन की हर कठिनाई को पार कर पाएंगी। विधवा पुनर्विवाह जैसे मुद्दे को लेकर सिर्फ हवा हवाई नहीं, बल्कि व्यवहारिक बात करनी होगी। विधवा पुनर्विवाह से संबंधित और अधिक कड़े कानून बनाने एवं लागू करने की आवश्यकता है। साथ ही महिलाएंँ भी इतनी सशक्त हों की उनको संबंधित सभी कानूनों के बारे में जानकारी हो और उनमें इतनी क्षमता हो कि आड़े वक्त में अपने अस्तित्व के लिए रूढ़िवाद के खिलाफ आवाज उठा सके। आइये सुंदर कल की ओर मिलकर कदम बढाते हैं.....  

#परम्परा
✍ रागिनीप्रीत

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