ये बुजुर्ग हमारी शान

ये  बुजुर्ग हमारी शान

भारतीय संस्कृति में परिवार के वरिष्ठ जनों अथवा बुजुर्गों का सम्मान देने उनकी सुख सुविधाओं का हर क्षण ध्यान रखने की प्राचीन परम्परा रही है। परिवार में कोई भी कार्य करने से पूर्व वरिष्ठ जनों से सलाह मार्ग दर्शन एवं आशीर्वाद लिया जाना आवश्यक माना जाता था।
 वर्तमान में पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से भारत में संयुक्त परिवार की प्राचीन परंपरा समाप्त हो रही है। एकल परिवार बढ़ते जा रहे है। एकल परिवार में सबसे ज्यादा उपेक्षा बुजुर्गों की हो रहीहै। 

परिवार की शान कहे जाने वाले हमारे बड़े-बुजुर्ग आज परिवार में अपने ही अस्तित्व को तलाशते नजर आ रहे हैं। तिनका-तिनका जोड़कर अपने बच्चों के लिए आशियाना बनाने वाले ये पुरानी पीढ़ी के लोग अब खुद आशियाने की तलाश में दरबदर भटक रहे हैं। 
इतिहास के पन्ने पलट लीजिये. या अपने घर या किसी के भी घर में इस बारे में जाँच पड़ताल कीजिये की जो व्यक्ति अपने माता पिता या दादा दादी का जितना सम्मान करता है आगे चलकर उसे वही मिलता है।
समाजपरिवार में बुजुर्ग वटवृक्ष का रूप होता है। उनके आदर्श संस्कारों का युवा पीढ़ी को जीवन में अनुसरण करना चाहिए। बुजुर्गों का मान-सम्मान हमारी स्वस्थमानसिकता का परिचायक है।
आज वृद्ध अपने ही घर की दहलीज पर सहमा-सहमा खड़ा है, उनकी आंखों में भविष्य को लेकर भय है, असुरक्षा और दहशत है, दिल में अन्तहीन दर्द है। 
इन त्रासद एवं डरावनी स्थितियों से वृद्धों को मुक्ति दिलानी होगी।  हम पारिवारिक जीवन में वृद्धों को सम्मान दें।
बुजुर्ग हमारी अनमोल विरासत हैं इसलिए इनका सम्मान करना हमारा फर्ज है।
यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम बच्चों को बुजुर्गों का सम्मान करना सिखाएं और उन्हें यह भी बताएं कि इस देश व उनके लिए बुजुर्ग कितने आवश्यक व मूल्यवान हैं।

अनु गुप्ता

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