ये तारे कहीं बिखर न जाएं

इस फिल्म में यह बताने की कोशिश की गई है कि किताबों से हटकर भी बच्चों में रूचियाँ होती हैं । सिर्फ नंबर्स से उनको  जज करने से बेहतर है कि उनकी अन्य प्रतिभा को  पहचान कर उस ही दिशा में ले जाया जाए ।

ये तारे कहीं बिखर न जाएं

तारें जमीं पर
  इस ब्लाग में ज़िक्र करुंगी  सन् 2007 में आमिर खान द्वारा निर्मित-निर्दशित  फिल्म " तारे ज़मीं पर" का ।
 बतौर एक शिक्षक ये मूवी मेरे दिल के बहुत करीब है । आज  जब  बच्चों का रिज़ल्ट आता है तो ज़्यादातर लोग उसके द्वारा कितने नम्बर पाए गए, इससे बच्चे का आकलन करते हैं। 
बहुत से पेरेंट्स भी की साइकॉलोजी नहीं समझ पाते हैंऔर बच्चों पर अपनी इच्छाओं को लाद देते हैं। ऐसे में बच्चे पर मानसिक दबाव बढ़ जाता है और वह प्राब्लेमेटिक चाइल्ड बन जाता है । 
बहुत ज़रूरी है कि बच्चों के रूझान और इच्छा के अनुसार उसे मार्ग दर्शन मिले। हर बच्चे की अलग क्षमताएं होती हैं उन्हें पहचान ना और उनके अनुसार बच्चों  को आगे बढ़ाना चाहिए। 
        ये मूवी  समाज के एक गंभीर  विषय पर बनी है जिसमें ईशान(दर्शील सफारी) नाम  के एक ऐसे बच्चे की कहानी  है जिसे डिस्लेक्सिया नामक बीमारी है उसे लिखे अक्षर  साफ नज़र नहीं आते हैं वह पढ़ाई में कमज़ोर है ।उसके घर वाले  चाहते हैं कि वह भी अन्य बच्चों की तरह पढाई में अच्छा हो पर उसका मन पढ़ाई में नहीं  है इसलिए उसे हॉस्टल भेज देते हैं वहां भी कोई अच्छा नहीं मानता  । मस्त रहने वाला ईशान हॉस्टल में  रोता है,गुमसुम और उदास रहने लगता है,मगर वहाँ उसे मिलते हैं मास्टर रमाशंकर (आमिर खान) जो ईशान को ड्राइंग बनाता देख कर उसकीअंदर की बड़ी प्रतिभा को पहचान लेते हैं। उसमें चीजों को पहचानने और ड्राइंग बनाने का टेलेंट है।वह ईशान को सपोर्ट करते हुए ड्राइंग- पेंटिंग में आगे बढ़ाते हैं।  वह आर्ट काम्पटिशन जीतकर अपने पेरेंट्स का नाम रोशन करता है ।साथ ही अन्य विषयों की भी जानकारी देते हैं। धीरे-धीरे ईशान तनाव और अवसाद से बाहर आ जाता है।  इसमें डिस्लेक्सिया के बारे में लोगों को जागरूक किया गया है कि नियमित उपचार से यह बीमारी सही हो सकती है। 
        इस फिल्म में यह बताने की कोशिश की गई है कि किताबों से हटकर भी बच्चों में रूचियाँ होती हैं । सिर्फ नंबर्स से उनको
 जज करने से बेहतर है कि उनकी अन्य प्रतिभा को  पहचान कर उस ही दिशा में ले जाया जाए । अपनी इच्छाओं को उन पर न लादा जाए ।  सभी पेरेंट्स  को चाहिए कि बच्चों पर  दबाव  न बनाए उनसे हद से ज्यादा अपेक्षाएं करने के बजाय उनकी रूचि का भी ध्यान दें।  आज समाज  को भी ऐसे ही टीचर्स की आवश्यकता है जो बच्चों का सही मार्ग दर्शन करें । 
  डॉ यास्मीन अली। 
        
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